
तर्क और तकरार दोनों
शब्द एक से लगते हैं,
पर अर्थ गहरे होते हैं,
परिणाम अलग रखते हैं।
तर्क है दीपक, जो तम चीरता है,
विवेक ज्योति से मन सींचता है,
तर्क में होता है सत्य का सम्मान,
तर्क से बढ़ता है ज्ञान का मान।
तकरार है आँधी, सब उड़ा देती है,
भरे-पूरे घर में दरार डाल देती है,
पर तकरार में अहंकार बोलता है,
रिश्तों का धागा वहीं डोलता है।
इसलिए हे मित्र, तर्क खूब करो,
विचारों की गंगा में गोते लगाओ,
पर तकरार से सदा बच के रहो,
रिश्तों की फुलवारी महकाओ।
आदित्य का तो यही कहना है,
तर्क गहना, तकरार झगड़ना है,
तर्क से बुद्धि धारदार होती है,
तकरार रिश्तों में दरार डालती है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













