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साथ।

तुम साथ भले न दो,पर साथ मेरे रहना,मुझे अकेलेपन की आदत, आदतन अब नही है।।

बात मेरी तुम जब चाहो ,नकार सिरे से देना,आदत मेरी पुरानी, अब भी वही रही है।।

तुम्हे याद अब न होगा,हम नेह मे थे शायद, तुम चाहो भुला भी देना,मुझे निभानी रस्म नही है।।

कायल तुम शौकीनियों के,हम फर्ज वाले साहब, आदत आदतों मे,फर्क है तो फर्क वही है।।

तुम टुकड़ा इक बदरी का,हम रिमझिम बरसे बारिश, मौसम सर्द गर्म का,एहसास सा वही है।।

जानते बह है जाना,हमे सिर्फ नालियों मे,तुम साथ तो हो न साहिब,अहसान बस यही है।।

संदीप शर्मा सरल
देहरादून उत्तराखंड

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