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भारतीय समाचार माध्यमों की विवशता व बदलता आचरण

आज सुबह सुबह की सैर के पश्चात,
दैनिक हिंदी समाचार पत्र पढ़ने लगा,
अट्ठाईस पृष्ठ इस दैनिक पत्र में थे,
विज्ञापन देखकर कुछ ऐसा लगा,
क्यों न विज्ञापनों के पृष्ठ गिन लें!

जब गिनना शुरू किया तो पहले चार
पृष्ठ बिना पृष्ठ संख्या भी वाले थे,
बाक़ी अंदर के पृष्ठ आधे विज्ञापन,
आधे अधकटे समाचारों वाले मिले।

कुल विज्ञापनों की भरमार, उनमें भी
ज़्यादातर बड़े बड़े मुख्यमंत्रियों,
मंत्रियों, प्रधान मंत्री, उनकी विभिन्न
घोषित योजनाओं, निजी संस्थाओं
विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और
अस्पतालों आदि के करिश्माई महान
कार्यक्रमों से ख़ूब भरपूर भरे पड़े थे।

समाचारों में पहला तो यह था कि
एक नेता के बेटे ने चार लोगों पर
अपनी बड़ी सी कार चढ़ाकर मार
डाला, फिर भीड़ ने कार वालों की
भीड़ के साथ आये हुये चार लोगों को
वहीं पर ही पीट पीट कर मार डाला।

अरबों रुपयों की बड़ी बड़ी योजनायें
कुछ सड़कों, संस्थाओं के नामकरण
कुछ के नाम बदलने के समाचार एवं
पक्ष विपक्ष में दल बदल के समाचार
मेरा एक घंटा बरबाद हुआ विज्ञापनो
के पूरे बारह पृष्ठ देखने और बिना
मतलब के समाचारों को पढ़ने में।

सबसे मज़ेदार समाचार तो सम्पादक
पृष्ठ की सम्पादकीय पढ़ने को मिली,
जिसमें उन्होंने भी और उनके लेखकों
के बड़े बड़े लेख छपे थे, अमेरिका की
और भारत में बिखरे विपक्ष की
आलोचना, सरकार को अस्थिर
करने की चिंता, समूचे विपक्ष का
देशद्रोह आतंकवाद से गहरा नाता !

कहीं स्त्रियों, बच्चियों से दुष्कर्म,
कहीं दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या,
कहीं अस्पताल के बाहर तड़पते
मरीज़ों की बिना इलाज हुई मौतें।

कुल मिलाकर यही लगा कि एक
तरफ़ पश्चिमी देशों के क़सीदे गढ़ना
कि वहाँ स्कूलों में वर्ष समाप्ति पर
विद्यार्थियों से पाठ्य पुस्तकें जमा
करवा ली जाती हैं और अगले साल
पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों को
नि:शुल्क पढ़ने को दे दी जाती हैं।

परंतु हमारे अमीर देश में पुरानी
किताबें रद्दी में बेचकर नई नई
किताबें नए पाठ्यक्रम के साथ छाप
कर विद्यार्थियों और अभिभावकों को
बेचीं जाती हैं और उनसे विद्यालयों
के प्रबंधन द्वारा सरकारी समर्थन से
मोटी सी रक़म भी वसूली जाती है।

आख़िर हम तो आत्मनिर्भरता की
ओर बढ़ चले हैं, विश्वगुरू बनने के
लिए फिर से हमारे कदम चल पड़े हैं,
नई शिक्षा नीति, नए सरकारी एवं ग़ैर
सरकारी कार्यक्रम, नए आधुनिक
नाम, सबका साथ, सबका विकास,
सबका विश्वास और सबका प्रयास
ही तो है नया नारा, जिसे माननीय
प्रधान मंत्री जी ने देश को दिया है,
आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए व
देश को विश्व गुरू बनाने के लिये।

आज का प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक
मीडिया और सोसल मीडिया तो कुछ
ज़्यादा ही विशेषज्ञता प्राप्त कर चुके हैं,
और देश की जनता को हर तरह से
भ्रमित कर केवल मोटी कमाई करने
का अनैतिक आचरण करने के छुद्र
मानसिकता के शिकार हो चुके हैं।

कुछ पढ़ने वालों को शायद अवश्य
बुरा लगेगा मेरा यह लेख पढ़कर,
उनसे सविनय छमा चाहता हूँ और
निवेदन करता हूँ की समाचार
मीडिया जो लोकतंत्र का चौथा
स्तम्भ माना जाता है उसे सही राह
पर चलने के लिए विवश करना
होगा, तभी देश के लोकतंत्र को
स्थिर व अक्षुण्य रखा जा सकेगा।

डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र, ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ

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