
वृत्त-पथ पर नील-कमल के, छाया आलोकिक छंद,
मधुर-मिलन का मूक विमर्श, गगन में गुंजित आनंद।
कण-कण में जो प्राण-रसिकता, वायु-तरंगित वेणु-विलास,
चित्रित हुआ वह भाव-गुह्य, यमुना-कूल समीर-सुप्रकाश।
नयन-नदी की मौन तरंगें, युगल-प्रवाह अमर-अलिखित,
कुंज-विपिन में गुप्त समीरण, मृदु मर्मर-राग सुमिलित।
विभु-सुधा में जो ब्रज-विलासी, अनुगामिनी तनु-पथ में लीन,
वह कांत-सुधाकाश अचंचल, हृदयाकाश में रचता प्रवीण।
ऋचा चंद्राकर “तत्वाकांक्षी”
कौंदकेरा (महासमुंद)











