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कविता

चांद ने था कुछ जो कहा,आसान नही था समझना,
मैं बात समझता था रहा,पर प्यार नही था समझना।।

वो रीत रखे सब कह गया,थी प्रीत नही ये समझना,
शौकीन कुछ मिज़ाज था,शौकी को उसकी समझना।।

था दूर सफ़र के साथ मे,हमसफ़र नही रे समझना,
वो बात रीत और प्रीत की,उससे विलग ही समझना।।

हाँ दाग जो दिखते है वहा,वो दाग है प्यार के समझना,
जो शिकवे शिकायत थी रही,रिवायत है ये उसकी समझना।।

है रहा कभी टिका नही,रंग रूप को उसके समझना,
कहता कुछ और चाहता कुछ ही,उसकी रीत को समझना।।

जो करते तुम इज़हार हो तो चांद को प्रीत न पूछना,,
वह कहता तुम गुनहगार हो,चांदनी की चांद से पूछना।।


संदीप शर्मा सरल
देहरादून उत्तराखंड

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