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जीवन में बैलेंस किधर है


सच , जीवन के आपाधापी की दौड़ में
बैलेंस किधर है
सभी दौड़ लगा रहे इधर-उधर हैं
जीवन के इस खेल में संतुलन बिगड़ रहे हैं
रिश्तों की अहमियत अब कहां रही
सिर्फ और सिर्फ स्वयं का सोचते-स्वयं का करते
पर्व- त्यौहार के मायने ही बदल गए हैं
परंपरा को भूलकर पश्चिमी सभ्यता की ओर बढ़ते जा रहे हैं
सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया को
हथकंडा बनाकर अपने को चर्चा में लाना ही इनका धर्म- कर्म है
ऐन -केन प्रकारेण दिखावे को महत्व देते हैं
घर में बूढ़े दादा- दादी, मां-बाप के लिए कोई सम्मान नहीं
ना ही भाई -बहन के प्रति प्रेम -भाव
अपनी सभ्यता संस्कृति को भूल चुके हैं
जबकि जरूरत है जिंदगी को बैलेंस करके चलना
तभी मानव सफलता की ओर अग्रसर
हो पाएगा
अपने लक्ष्य को निश्चित रूप से हासिल कर पाएगा
अपने जीवन को हंसी-खुशी के साथ
जी पाएगा

डॉ मीना कुमारी परिहार

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