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बिन पते की चिट्ठी।।

लौट आई ,वह बिना पते की चिट्ठी, जब डाकिए ने आकर कहा, वहा अब कोई इंसां नही बसता,
थी गुलज़ार कभी ,वो मिट्टी ,जहां अब कोई इंसान नही बसता।।

ये दुनियाँ,-2,
दिल वालो की कहाँ उजड़ गई,
वो जो बस्ती थी हँसती सजती ,
कहां सिकुड़ गई।।

कदर इंसानियत की ,
जहां हुआ करती,थी,
इंसानियत कोई बताएगा,
कहां बिखर गई।?।

जान कर भी ,कि अब वो पता है नही ,
मैं लिखता हूँ ,उस पते पर रोज इक चिट्ठी, ताकि सनद रहे ,कि थी इक दुनियाँ इंसानियत की हँसती बसती
जो थी कि उजड़ गई,।।

दुनियाँ गुड्डे गुड्डों की ,
दुनियाँ परियों गिट्टों की ,
व मुनियाँ ,बिट्टू शजियां की,
सब बिखर गई।।

ऐसे मे
लिखना इक चिट्ठी ,
वह भी उस पते की, दीवानगी नही,।।

न ,बिल्कुल न ,इसे दिवानगी न, समझना, यह प्रयास है, लौटा लाने को, इंसानियत,
इसे इम्तिहान ही समझना।।

यह प्रयास, गहरे और गहरे होने चाहिए, और मेरे साथ साथ तुम्हारे और सारों के भी होने चाहिए।।

क्यूं,
फिर वही क्यूं,
ताकि सनद रहे,
कि बसती थी जो दुनियाँ ,
भर दुनियाँ को ,,खबर रहे।।

यह पते
यह पते हमे फिर से सजाने होगे,
बसा कर इंसानियत को,
पते वहीं लौटाने होगे ।।

और देखना,
देखना,कि मैंने ,नामें मे,
पहला नाम व पता अपना लिखा है,
और चाहा है लौटना, तुम भी सोचना,
गर लौटा लाया खुद को खुद मे ,फिर तुम भी सोचना।।

ये पते बेनामी नही रहने चाहिए, मेहनत है डाकिए के,और बिन नाम भी नही रहने चाहिए, ।।

इक ,हाँ,इक सरल सा प्रयास ,
सोचना होगा,
बिन पते की चिट्ठी को,
उसके बताए पते पर फिर से लौटना होगा ।।

संदीप शर्मा सरल
देहरादून उत्तराखंड

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