
रात का भय और स्वीकृति की गूँज अभी भी गाँव के आसमान में तैर रही थी।
लेकिन सुबह, जैसे किसी नई परीक्षा का सूर्योदय हो।
सूरज की पहली किरण जब चौपाल तक पहुँची,
गाँव के बूढ़े-बुजुर्ग, औरतें, नौजवान—
सभी अपने-अपने अंदर दबे सवालों और डर को लेकर
धीरे-धीरे चौपाल पर इकट्ठा होने लगे।
बरगद के पेड़ की छाया में पंचायत बिछी थी।
और बीच में, एक खाली आसन रखा था—
उसी पर बैठकर कभी हरिचरण फैसले सुनाया करता था।
आज वह खाली था।
उसका खालीपन ही एक मौन न्याय जैसा लग रहा था।
गंगाराम धीरे-धीरे आया।
लोगों ने उसे रास्ता दिया।
उसकी आँखों में रात का सच अभी भी चमक रहा था।
“आज की पंचायत सिर्फ एक मामले की नहीं,”
गंगाराम ने शांत पर तेज आवाज़ में कहा,
“यह गाँव की आत्मा की परीक्षा है।”
लोगों ने साँसें रोक लीं।
तभी दरोगा हरिचरण को लेकर आया।
उसका चेहरा रातभर रोने और स्वीकारोक्ति से
और भी बुझा हुआ था।
पर गंगाराम की नज़रें उससे आगे देख रही थीं—
किसी और की ओर।
“मुखिया के भाई का पर्दाफाश”
गंगाराम ने भीड़ की ओर देखते हुए कहा—
“हरिचरण अकेले नहीं था।
किसी ने उसके मन में विष भरा।
किसी ने उसे उकसाया।
किसी ने उसकी लालसा को धार दी।”
लोग समझ रहे थे कि यह इशारा किसकी तरफ है,
पर कोई बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
तभी गंगाराम ने एक नाम लिया—
“कैलाशचरण!”
भीड़ में हलचल मच गई।
मुखिया हरिचरण का छोटा भाई—
दबंग, चालाक, और उतना ही खतरनाक।
कैलाशचरण जो अब तक छुपा हुआ था,
भीड़ के पीछे से निकलने लगा।
उसके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि चुनौती थी।
“मुझ पर आरोप?”
उसने हँसते हुए कहा।
“मेरे खिलाफ सबूत क्या है?”
गाँव खामोश हो गया।
गंगाराम ने उसी खामोशी में कहा—
“सबूत देगा वही…
जो आज तक आवाज़ नहीं उठा पाया।”
कैलाशचरण ने व्यंग्य से कहा—
“कौन? गोधन? वो तो मर चुका।”
गंगाराम ने कहा—
“हाँ, मर चुका।
पर उसका सच ज़िंदा है।
और कुआँ भी।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
“ कुएँ की दूसरी गवाही ”
सभी को कुएँ के पास ले जाया गया।
कुएँ की गहराई से ठंडी हवा उठ रही थी—
जैसे कोई अनकहा सच वर्षों बाद सतह तक आ रहा हो।
गंगाराम ने मुंडेर पर हाथ रखा और कहा—
“गोधन अकेला नहीं था जिसे डाला गया।
दूसरी रात… एक और चीख आई थी,
जिसे सबने सुना पर किसी ने माना नहीं।
क्योंकि सब जानते थे—
उस रात कैलाशचरण भी वहीं था।”
कैलाशचरण चिल्लाया—
“झूठ! बकवास!”
गंगाराम आगे बढ़ा—“मैं मरकर लौटा हूँ, कैलाश।मिट्टी की परतों से होकर आया हूँ।वहाँ आवाज़ें रहती हैं…
वे बातें करती हैं, रोती हैं,
और कभी-कभी सच भी कह देती हैं।”भीड़ काँप उठी।
गंगाराम ने कुएँ में झाँककर कहा—
“शांत रहो…
अब तुम्हारी बारी है बोलने की।”
हवा अचानक धड़ाम से ऊपर उठी।
कुएँ के भीतर से क्षीण पर स्पष्ट आवाज़ आई—
एक महिला की।
“…मुझे मत धक्का दो…
मेरी गलती क्या थी…”
गाँव की तीन औरतें एक साथ चीख पड़ीं—
“ये तो सीतवानी की आवाज़ है!”
सीतवानी—
वह दलित महिला जो एक रात गायब हुई थी,
और जिससे कहा गया था कि वह भाग गई।
जबकि जितना सच था,
उतना झूठ भी उसी कुएँ में दफन कर दिया गया था।
कैलाशचरण का चेहरा राख हो गया।
गंगाराम ने कहा—
“तुमने उसे छेड़ा।
उसने विरोध किया।
तुमने बदले में उसे कुएँ में धकेल दिया।”
कैलाशचरण चिल्लाया—
“ये सब नाटक है!
कुएँ में भूत नहीं होते!”
गंगाराम शांत बोला—
“भूत नहीं होते,
पर न्याय की आवाज़ें होती हैं।
और वही आज तुमको जवाब दे रही हैं।” कैलाशचरण अचानक भागने लगा,
पर भीड़ ने उसे पकड़ लिया।
उसकी आँखों में अब पहली बार डर था—उस आवाज़ का,
जो मरकर भी नहीं मरी थी।
“गंगाराम की मौत से वापसी का रहस्य”
पंचायत ने दोनों भाइयों—हरिचरण और कैलाशचरण—को पुलिस के हवाले कर दिया।
लेकिन भीड़ के मन में एक और प्रश्न जल रहा था—गंगाराम मौत से लौट कैसे आया?
रामशरण ने आखिर पूछ ही लिया—
“गंगाराम, तू क्या सच में मर गया था?”
गंगाराम कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने अपनी कहानी कही—
“उस रात…जब मुझे कुचलकर मरा हुआ समझकर फेंका गया,
मैं साँस ले रहा था… बस बहुत हल्की।
कुएँ की नमी ने मेरी साँसें धीमी कर दीं,और वही मुझे बचा गई।
पर उससे भी बड़ा चमत्कार…
वह था जो मैंने नीचे सुना।”
भीड़ मंत्रमुग्ध थी।
“कुएँ की तली में…
मुझे दो आवाज़ें सुनाई दीं—
गोधन और सीतवानी की।
वो मुझसे बात करने लगीं।
बताने लगीं कि कौन दोषी है,
कौन गवाह,
कौन डर से चुप,
कौन स्वार्थ में अंधा।
मैं मर नहीं रहा था,
पर मौत की छाया ने मुझे
उन आवाज़ों के इतना करीब ला दिया
कि मैं उनका सच सुन सकता था।”
भीड़ में किसी ने धीरे से कहा—
“ई आदमी अब सामान्य नहीं रहा…”
गंगाराम मुस्कुराया—
“मैं तो बस एक रास्ता हूँ।
वो आवाज़ें…वे मुझे लौटाकर ले आईं।
कहकर—हमारा सच गाँव तक पहुँचा देना।’”
“ गाँव का अंतिम न्याय ”
शाम तक पूरा गाँव चौपाल पर इकट्ठा था।पंचायत ने फैसला सुनाया—
दोनों भाइयों पर हत्या, शोषण और साजिश का केस दर्ज हुआ।
गाँव में पहली बार दलितों और गरीब किसानों के लिए
ज़मीन विवादों की स्वतंत्र समिति बनी।
कुएँ पर लोहे की जाली और एक शिलालेख लगाने का निर्णय हुआ—
“यहाँ सच दफन नहीं होता।”
रात को,
जब सब लोग जा चुके,
गंगाराम अकेला कुएँ के पास खड़ा था।
कुएँ से एक धीमी, राहत-भरी हवा उठी—
जैसे कोई बोझ झड़ चुका हो।
गंगाराम ने कहा—
“गोधन, सीतवानी…
तुम्हारा काम पूरा हुआ।
अब शांति से सो जाओ।”
बरगद की पत्तियों ने हल्की सरसराहट की।मानो अंतिम विदाई दे रही हों।
गाँव की मिट्टी भारी नहीं रही।
पहली बार वह साँस ले रही थी।
आर एस लॉस्टम












