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मेरे अनकहे ख़्वाब



​रात की गोद में जो आँखें बंद हुईं,
दिखे कुछ नक़्श थे, कुछ रंग थे नए।
सोने के धागों से बुने हुए मंज़र,
हथेली छू के जो हवा में उड़ गए।
ओ मेरे अनकहे ख़्वाब,
ओ मेरे अनसुलझे राज़,
तुम अब भी क्यूँ मेरी साँसों में,
बजते हो बनकर साज?

​वो सपने जो पूरे न हुए,
वो वादे जो छूटे हवा में।
एक टीस सी बनके रहे दिल में,
एक कसक बनके रहे सदा में।
न कोई पता, न कोई ठिकाना,
बस यादों का एक आना-जाना।
ओ मेरे अनकहे ख़्वाब…

​कितनी सुबहें हुईं, कितने मौसम गुज़रे,
उन राहों पे, जहाँ चलना था कभी।
कितनी बातें हुईं, कितने लब चुप रहे,
जो तुमसे कहना था, वो रह गया यहीं।
एक कागज़ कोरा, एक गीत अधूरा,
रह गए बस निशान, अब न होगा पूरा।
क्यूँ मेरी आँखों में शबनम सी भरते हो आज?

​अब तो बस ये तमन्ना है दिल में,
कि अगले जनम फिर से आना।
शायद तब ये दूरी न हो,
शायद तब पूरा हो हर फ़साना

         "जय हिंद" 

     रीना पटले,शिक्षिका 
  जिला- सिवनी, मध्यप्रदेश

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