
यहाँ यतीम ज़्यादा हैं,
यतीमखाने कम—
दुनिया की छत भले विशाल हो,
पर दिलों की चौखटें अब भी संकरी।
पुराने चौराहे पर
एक बुझा हुआ लालटेन खड़ा था;
उसकी लौ मर चुकी थी,
पर उसी के नीचे
उम्मीदें हर शाम नया जन्म पाती थीं।
सरयू—एक दुबला-पतला लड़का,
जो हवा को ही माँ पुकारता था,
अक्सर कहता—
“हवा ने ही मेरी पहली रोदन सुनी थी,
वही मेरी पहचान जानती है।”
एक दिन जब बारिश उतरी,
एक छोटी-सी मिन्नी
भीगती हुई उस स्तंभ के पास आई—
हाथों में टूटी स्लेट,
आँखों में टूटा हुआ जगत।
सरयू ने अपनी पतली चादर
धीरे से उसके सिर पर रख दी—
“कहाँ रहती हो?”
और उसने फुसफुसाया—
“कहीं नहीं…”
बारिश कुछ पल को थम गई,
जैसे आँसुओं की भाषा पहचान गई हो।
सरयू हल्का-सा मुस्कुराया—
“तो अब तू यहीं रहेगी…
हवा के इस घर में।”
धीरे-धीरे
वही पुराना लालटेन
बच्चों की नन्ही दुनिया बन गया—
जहाँ रोटियाँ भले कम थीं,
पर हँसी का उजाला बहुत था।
जहाँ कोई माँ नहीं थी,
पर हर हाथ में
ममता की चुप गरमाहट थी।
फिर एक शाम
पुष्पा दी वहाँ आईं—
और बच्चों की ओर देखते ही
उनकी आँखों में
दया का दीपक जगमगा उठा।
उन्होंने कहा—
“अगर यतीमखाने कम हैं,
तो दिलों को यतीमखाना बनना ही होगा।”
और अगले दिन
लालटेन के नीचे
पढ़ाई की पहली लौ जली।
किताबों की सरसराहट में
हवा ने भी ज्ञान का स्वर सीखा।
वर्षों बाद
उसी स्थान पर एक बोर्ड लगा—
“अनाथ हवा विद्यालय”
हर उस बच्चे के नाम
जिसका घर हवा में बिखर गया था।
सरयू अब स्वयं
गुरु की तरह मुस्कुराता खड़ा होता है
और नए बच्चे से कहता है—
“डरो मत…
यहाँ यतीमी भले अधिक हो,
पर अब दया भी कम नहीं।”
हवा अब भी बहती है—
पर अब वह सिर्फ़ अनाथों को ढूँढती नहीं,
उन्हें
अपना एक घर भी दे जाती है।
आर एस लॉस्टम












