
चौराहे पर खड़ी वह आकृति
जैसे हवा में गढ़ी हुई कोई धुंध थी—
धीमे-धीमे नज़दीक आती हुई,
पर फिर भी दूर लगती हुई।
लोग साँस रोके खड़े थे।
लालटेन की पीली काँपती रोशनी
उस पर पड़कर बार-बार टूट रही थी,
मानो रोशनी भी तय नहीं कर पा रही हो कि वह किसका चेहरा दिखाए।
रामशरण ने गला सूखते हुए कहा—
“गंगा… ये कौन है?”गंगाराम ने आँखें झुका लीं। “ये कोई व्यक्ति नहीं, रामू…
ये अपराध है।जो चेहरे बदल-बदलकर लौटता है।” लोगों की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
चेहरा धुंध से बनता है
जैसे ही आकृति चौराहे की सीमा में पहुँची, उसका चेहरा धुंध से बनता–बिखरता रहा।
कभी एक बूढ़ा आदमी,
कभी एक जवान लड़का,
कभी एक औरत—
और फिर अचानक
चौपाल के पुराने चौकीदार की शक्ल!
एक आदमी चिल्ला पड़ा—
“अरे ये तो रामजीत है!
डस साल पहले तालाब में डूब कर मरा था!”
एक और बोला—
“नहीं, ये तो हरिचरण लगता है—
जिसकी हत्या दंगों में हुई थी!”
लोगों की आवाज़ें काँपने लगीं।
किसी के दिल में पुराने पाप उभर आए, किसी के मन में दबा हुआ अपराधबोध।
आकृति जैसे लोगों की बातों से
अपना चेहरा चुनने लगी—
और अंत में
एक ऐसी शक्ल पर आकर ठहर गई
जिसे देखकर
सारा गाँव पत्थर बन गया।
वो चेहरा था—
धरमवीर का।
धरमवीर— जिसे दस साल पहले
झूठे चोरी के इल्ज़ाम में
गाँव वालों ने खुद पीट-पीटकर मार दिया था।
कई लोगों ने नज़रें झुका लीं—
किसी ने पत्थर फेंका था,
किसी ने लात मारी थी,
किसी ने बस तमाशा देखा था।
आकृति ने होंठ हिलाए—
कोई आवाज़ नहीं निकली,
पर शब्द हवा में फैल गए—
“मैं वापस नहीं आया…
तुम्हारा अपराध आया है।”
सच का पहला थप्पड़
दाई, जो अब तक रो रही थी, जमीन पर बैठ गई। उसके सामने धरमवीर की पत्नी कभी घंटों बैठकर रोती थी।
गाँव ने कभी उसे इंसाफ नहीं दिया।
गंगाराम अगली पंक्ति बोला—
“जो अधूरा मरता है,
वह लौटकर न्याय नहीं माँगता…
सिर्फ सत्य दिखाता है।”
रामशरण ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
“हमने… हम सबने क्या किया था?”
गंगाराम ने उसकी ओर देखा—
“तुमने उसे मारा नहीं, रामू—
पर उसके मरने में शामिल थे।”
रामशरण टूट गया।
वह जमीन पर बैठकर बाल पकड़कर रोने लगा।
धरमवीर की परछाई
धीरे-धीरे लोगों के चारों ओर घूमने लगी।
जहाँ-जहाँ जाती,
वहाँ-वहाँ लोग पीछे हट जाते—
क्योंकि हर आदमी को लगता
वह उसी की तरफ बढ़ रही है।
बरगद का हिलना
अचानक बरगद का मोटा तना
अंदर से दरकने लगा।
जड़ों में फँसी सूखी मिट्टी टूटकर गिरने लगी। और फिर—पेड़ के तने से
एक कटी हुई रस्सी नीचे गिरी।
लोग चीख उठे। गंगाराम ने धीमे से कहा—“धरमवीर को पीटा था…
पर उसके गले में सच ने फंदा डाला था।”गाँव का दिल धक से बैठ गया।
अभिशाप या न्याय?
धरमवीर की परछाई
अचानक वहीं रुक गई—
चौराहे के ठीक बीचोंबीच।
फिर उसने अपनी उँगली
एक घर की तरफ उठाई।
वो घर था—गाँव के उस सरपंच का
जिसने झूठा इल्ज़ाम लगाया था।
जो अभी तक गाँव में
इज्ज़तदार आदमी कहलाता था,
पर अपनी पत्नी और बच्चों तक से
अपनी वह रात नहीं बताता था।
सरपंच के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसकी टाँगें काँपने लगीं।
लोगों ने उसकी तरफ देखा—
नफरत से, सवालों से, और डर से।
गंगाराम की आवाज़ धीमी, स्थिर और भारी थी—“आज पहली परछाई ने अपना अपराध दिखा दिया।
अब गाँव को ये फैसला करना है—
सच का सामना करेगा
या अगले अपराध की परछाई उठेगी।”
धरमवीर की आकृति
धीरे-धीरे हवा में घुलने लगी।
उसका अंतिम वाक्य
गाँव पर चाबुक की तरह पड़ा—
“मैं नहीं लौटा…
पर अगला लौटेगा।”
अंधेरा और भारी हो गया।
और लोग समझ गए—
आज की रात
सिर्फ शुरुआत थी।
आर एस लॉस्टम











