
तपः स्वाध्यायेश्वरप्राणिधानानि क्रिया योगः ।
तप:स्वाध्यायेश्वरप्राणधानानि= तप-स्वाध्याय और ईश्वर शरणागति– ये तीनों; क्रियायोगः= क्रिया योग हैं ।
अनुवाद– तप, स्वाध्याय और ईश्वर शरणागति ये तीनों ‘क्रिया योग’ हैं ।
व्याख्या– योग दर्शन के अन्तर्गत महर्षि पतंजलि ने चित्त वृत्तियों के निरोध को ही योग कहा है । इस निरोध के फल-स्वरूप आत्मा की अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है । जो जीव की अन्तिम अवस्था है जहाँ पहुँचकर उसका संसार में फिर से आगमन नहीं होता ।
इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए अभ्यास, वैराग्य तथा ईश्वर प्रणिधान की आवश्यकता बतलाई है किन्तु ये सब साधन उसके लिए है जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, जो योग साधना में लगा हुआ है तथा जिसका पूर्व अनुभव है —
सामान्य व्यक्ति जो साधना आरम्भ करना चाहते हैं उनके लिए यह साधन पाद ही महत्वपूर्ण है
जिस पर चलकर वह निर्बीज समाधि उपलब्ध हो सकता है ।
योग की उपलब्धि के लिए दो मार्ग हैं । पहला क्रिया का तथा दूसरा अक्रिया का । सांख्य में अक्रिया को ही मार्ग बतलाया है । इसमें बताया गया है की क्रिया मात्र बन्धन है ।
प्रत्येक कर्म अपना फल अवश्य देता है जिससे मुक्ति की संभावना नहीं है । किन्तु योग क्रिया की बात कहता है क्योंकि मन स्वभावतः क्रिया में ही रुचि लेता है । अतः योग साधना का आरम्भ क्रिया से ही किया जाता है किन्तु कर्म की गति स्वर्ग से आगे नहीं है इसलिए मुक्ति के साधक को वहाँ पहुँचने पर अक्रिया में प्रवेश करना होता है । आरम्भ से ही यदि कोई साधक सीधा अक्रिया मार्ग अपनाता है तो वह आलसी एवं निकम्मा होकर पथभ्रष्ट भी हो सकता है । इसलिए योग का मार्ग निरापद है ।
महर्षि पतंजलि इस साधन पाद में सर्वप्रथम ‘क्रिया योग’ को बतलाते हैं जो मोक्ष प्राप्ति में सहायक है । ये हैं तप स्वाध्याय तथा ईश्वर शरणागति । इसमें ‘ईश्वर शरणागति’ अकेला ऐसा साधन है जिसमें साधक पूर्ण रूपेण अपने शरीर, मन, बुद्धि एवं अहंकार सहित ईश्वर को समर्पित कर देता है । वह अपना निजत्व समाप्त कर ईश्वर की मर्जी के अनुकूल कार्य करता है । वह स्वयं बाँस की पोंगरी {बाँसुरी} लेता है जिसमें सारे स्वर उसी ईश्वर के होते हैं ।
वह अपने को खाली कर देता है जिससे ईश्वर उसका हाथ थाम लेता है । वह समस्त कर्म ईश्वर के समझ कर उसी को आज्ञा से करता है तथा उनका फल भी उसको अर्पित कर देता है । ऐसा साधक कर्म संचय नहीं करता । उसकी चित्त वृत्तियाँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं । जिससे वह मोक्ष का अधिकारी होता है ।
यदि वह पूर्ण रूपेण समर्पित नहीं हो सकता तो उस ईश्वर के गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन करना, उसी से प्रेम करना आदि क्रियाओं से भी भक्ति भावना जाग्रत कर सकता है । यहाँ ईश्वर शरणागति का यही अर्थ है पूर्ण समर्पण इस प्रारम्भिक अवस्था में सम्भव नहीं है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
साधक– बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार











