
समाधिभावनार्थ: क्लेशतनूकरणार्थश्च ।
समाधिभावनार्थः= {यह क्रियायोग} समाधि की सिद्धि करने वाला; च= और; क्लेश तनूकरणार्थः= अविद्या आदि क्लेशों को क्षीण करने वाला है ।
अनुवाद– यह क्रिया योग समाधि की सिद्धि करने वाला और अविद्या आदि क्लेशों को क्षीण करने वाला है ।
व्याख्या– इस सूत्र में ‘क्रिया योग’ का फल बतलाया गया है कि इस साधन से अविद्या आदि जितने क्लेश हैं वे क्षीण होते हैं तथा साधक को समाधि की सिद्धि होती है । यह क्लेश ही मनुष्य को संसार में भटकाने वाले हैं जो पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण हर जन्म में अपना प्रभाव दिखाते हैं । आत्म-स्वरूप के ज्ञान के बिना इसका क्षय नहीं होता किंतु इन्हें क्रिया योग से क्षीण करके आगे साधना के मार्ग में बढ़ा जा सकता है किंतु इसका पूर्ण क्षय निर्बीज समाधि में ही होता है । इन साधनों से समाधि की योग्यता आ जाती है क्योंकि क्लेशों के क्षीण होने से मन स्थिर हो जाता है । जब तक की पांचो क्लेश तीव्र हैं तब तक समाधि की भावना नहीं हो सकती तथा समाधि की भावना बिना ए क्लेश ढीले नहीं पड़ सकते ।
{आगे सूत्र 3 में निकले शिव को बताया गया है} ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम कर शुक्ल हरिद्वार











