
सुनो सखी–
तुम जग- जननी हो।
तुम सब कुछ कर सकती हो।
तुम ढाई किलो का लहंगा पहन कर नाच सकती हो।
तुम भोजन से भूखे की भूख शांत कर सकती हो।
तुम नव-जीवन का निर्माण कर सकती हो।
तुम शिशु के संग चंचल बन सकती हो।
तुम कुमारी अवस्था में मर्यादा की आस बन सकती हो।
तुम मुश्किल समय में अपने प्रियतम की हिम्मत बन सकती हो।
तुम पिता के लिए हंसी का पर्याय बन सकती हो।
तुम मां के लिए बचपन का दोहराव बन सकती हो।
तुम भाई के लिए एक मजबूत साथ बन सकती हो।
तुम पति के लिए समर्पण कर सकती हो।
तुम दोस्तों के साथ बाहर जा सकती हो।
तुम नौकरी कर घर चला सकती हो।
तुम चांद पर जा सकती हो।
तुम खेल में अपना लोहा मनवा सकती हो।
तुम समाज की सोच से लड़ सकती हो।
बस याद रखना– तुम कर सकती हो।
संजना पोरवाल










