
फागुन पूरन मास है, लाता खुशियाँ संग।
झूम रहे नर-नारियाँ, मन में भरे उमंग।।
जले होलिका द्वेष का, सबमें हो सद्भाव।
सतरंगी हो हर दिशा, दुख का रहे अभाव।।
महुआ और पलाश से, सुंदर लगे बसंत।
मंद पवन भी भा रहा, हुआ शीत का अंत।।
बौर लगे तरु आम्र में, महक उठे चहुँ ओर।
कितना सुंदर लग रहा, नाचे सब बन मोर ।।
रंग अबीर-गुलाल को, चलो लगाएँ मीत।
हरदम बढ़ता ही रहे, ऐसे कर लो प्रीत।।
हुड़दंगी को छोड़कर, स्वच्छ रखो परिवेश।
शांति समन्वित पर्व हो, मिटे सभी का क्लेश।।
आडंबर को त्याग कर, मन को कर प्रहलाद।
धर्म सदा अपना निभा, रख मर्यादा याद।।
ढोल नगाड़े बज रहे, मोहक है हर रंग।
चुन लो इनमें जो बने, प्रभु का मिलन प्रसंग।
जकड़ रखे ना रूढ़ियाँ, कर लो नव निर्माण।
याद करे सारा जहाँ, ऐसे बनो प्रमाण।।
-द्रौपदी साहू
छुरी कला, कोरबा (छ.ग.)










