
भक्त प्रह्लाद लिया जन्म,उस दानव भवन मे
जहाँ ष्रीहरि का नही भजन,करे कोई भी मन मे
प्रबल शत्रु थे वे दानव,ष्रीहरि के अपार
मार देते थे वो उनको ,जो कर ष्रीहरि का प्रचार
भक्त प्रह्लाद नाम के उस बालक,थे निडर अपार
हर वक्त करते थे,हरि नाम का प्रचार
दानव के भवन मे,मानव का जन्म
कर ना सका,वो दानव सहन
भक्त प्रह्लाद को ही प्राण का अंत,किये वो विचार
बहन होलीका के गोद रख,चिता मे दिया सवार
थी एक ऐसी चादर,पास मे होलिका के
अग्नि जला न सके ,जो धारण करे इसके
ष्रीहरि के माया समझ ना पाये,जग मे कोई
हवा चली ऐसी कि,चादरभक्त प्रह्लाद पर आई
धू धू कर जल उठी होलिका,हुए बुराई का अंत
दानव का एक कुटिल चाल का,हुआ अंत
अंतिम वक्त मे दानव का भी मौत आया निकट
भक्त प्रहलाद के पुकार सुन,हरि हुए खंभे से प्रकट
चहुंओर गुजी जय जय कार सब हुए प्रसन्न
भक्त प्रहलाद ने हाथ जोड़े, ष्री हरि को किया नमन
चुन्नू साहा पाकूड झारखण्ड










