
आ रहा है,,
वह शब्द सरिता का
अविरल प्रवाहl
उतरकर वो मेरी कलम से,
कागज पर कहीं गीत, कविता या ग़ज़ल बना रही है l
मैं कहीं कवि या शायर तो नहीं,,,
मेरा शब्द शब्द लफ्ज़ बनकर वह ,,काव्यांजलि
अभिषेक कर रही है ll
मैं कहीं कवि तो नहीं
शब्दों को यूं ही गुनगुनाता हूं,,,
लेकर सुगंध में शब्दों की सदा मुस्कुराता हूंll
यह जीवन हंसने खेलने के लिए है,,,
भूलकर में अब सब सुख-दुख को हमेशा खुश रहता हूं,ll
कह ने सुनने का जमाना नहीं,
इसलिए अब मैं मौन रहता हूं, ll
राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर ,मध्य प्रदेश










