
चारों और पैशाचिक युद्धों का ही दौर है
कारण जबर्दस्त मानवीय महत्वकान्क्षाओं का जोर है
इन्सान अब इन्सान नही स्वघोषित भगवान हो गया है
धनबल बाहुबल के नशे मे दूनियाँ को पैर की जूती मानने का अभिमान हो गया है
अहं ब्रम्ह ही इन्सान की ज़िन्दगी कुन्जी वाक्य हो गया
खुद की गलतियों को भुल दूसरों को सजा सुनाने लग गया
मार काट ही जीवन का एकलौता जीवंत उद्देश्य बन गया
प्रेम सदभाव इंसानियत कहीं गहरे सागर मे डूब गया
विनाशकाले विपरित बुद्धी की राह मनुष्य अब बढ़ चला है
खुद के महाविनाश की सेज अब सजाने लग पडा है
धरती मे अति के अन्त का ही ये एक कारण है
प्राकृतिक संतुलन का ईश्वरीय माकुल निर्धारण है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र










