
लड़की समझ डराओ मत,
ना छेड़ो, ना सताओ उसे।
मासूम सी है ,
यूँ खौफ मत दिखाओ उसे।
खिलता हुआ सा फूल है वो,
ज़रा खिलखिलाने दो उसे,
नापाक हाथों से छूकर,
यूँ मत मुरझाओ उसे।
चिड़िया सी आज़ाद है वो,
आसमान में चहकने दो,
ज़माने के तानों के शोर में,
यूँ मत खामोश कराओ उसे।
अगर उलझती है अपने सपनों में,
तो जी भर कर उलझने दो,
‘लोग क्या कहेंगे’ के डर से,
पीछे मत खींचो उसे।
लड़की समझ डराओ मत,
ना छेड़ो, ना सताओ उसे।
गर उसकी खुशी खटकती है,
तो अपनी आँखें फेर लो तुम,
उसकी खुशियों को दफ़न कर,
यूँ मत रुलाओ उसे।
लड़की समझ डराओ मत,
ना छेड़ो, ना सताओ उसे।
बेटियां बहन वह भी है किसी की,
जो रोज़ तुम्हारी नज़रों के,
सामने से गुज़रती है।
अपनी आँखों में पाप भर,
यूँ मत निहारो उसे।
लड़की समझ डराओ मत,
ना छेड़ो, ना सताओ उसे।
चोट लगे जो उसे कभी,
मरहम न लगाओ तो खैर है,
पर उसके ज़ख्मों पर वार कर,
यूँ मत गिराओ उसे।
बुरी नज़र से जो ताकते हो,
वो सह लेती है चुपचाप,
पर हवस के हाथों से छूकर,
यूँ मत बहलाओ उसे।
लड़की समझ डराओ मत,
ना छेड़ो, ना सताओ उसे।
गर ठुकरा दिया है उसने,
तुम्हारे प्यार का नज़राना,
तो क्या हुआ? एक इंसान समझ,
सम्मान से जाने दो उसे।
ज़रा सी ‘ना’ के बदले में,
तेज़ाब से मत नहलाओ उसे।
लड़की समझ डराओ मत,
ना छेड़ो, ना सताओ उसे।
अगर वो अपने पर आ जाए,
तो जड़ से उखाड़ फेंकेगी,
गर ‘सीता’ समझ बैठे हो उसे,
तो ‘दुर्गा-काली’ भी कम न आँको उसे।
लड़की समझ डराओ मत,
ना छेड़ो, ना सताओ उसे।
लड़की समझ डराओ मत,
ना छेड़ो, ना सताओ उसे।
स्नेहा कूमारी










