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प्यासी


कविता

प्यासी धरती नभ निहारे, कब बरसेगी धार।
सूखे पत्ते डोलते, जैसे दुखी विचार।

नदियाँ बैठी मौन सी, थम गई उनकी चाल।
बूंदों की उम्मीद में, व्याकुल हर एक ताल।

तप्त धरा की साँस में, जलता विरह अपार।
मेघ मिलन की चाह में, तरसे वन-उपहार।

प्यासे खेतों की नज़र, राह गगन की ताक।
किसान हृदय में पल रही, आशा की एक झाक।

मंद पवन भी कह रही, मेघों से यह बात।
आओ जीवन दे जरा, सूनी पड़ी है घाट।

जब बरसेगा मेघ तब, हँसेगी हर इक घास।
प्यासी धरती के अधर, खिल उठेंगे खास।

रचनाकार – कौशल

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