
हर कदम पर एक नया इतिहास लिखती है,
वो अंधेरों में भी रोशन आस लिखती है।
कभी ममता की मूरत, कभी हिम्मत की सूरत,
वो रिश्तों की मुकम्मल सी मिठास लिखती है।
उसे कमज़ोर समझने की खता कोई न करना,
वो चट्टानों के सीने पर नक्कास लिखती है।
तपिश हो धूप की या हो ज़माने की खामोशी,
वो अपने हौसलों से मीठा अहसास लिखती है।
कहीं वो बेटी, कहीं माँ, कहीं हमसफर बनकर,
ज़िंदगी के सफ़र की हर एक सांस लिखती है।
पंख देने की उसे तुमको ज़रूरत क्या है?
वो खुद ही अंबर पे अपनी परवाज़ लिखती है।
शेर :
”सिर्फ एक दिन नहीं, हर दिन तुम्हारा है,
इस कायनात का तू ही तो सहारा है।”
”खुद की पहचान को तूने खुद ही निखारा है,
ए नारी! तू ही हर डूबते को तिनके का सहारा है।”
रीना पटले, शिक्षिका
जिला सिवनी मध्यप्रदेश










