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शहर की रात और डर

चाँद मेरे दिल की सरहद पर रोज़ आकर चला जाता है,
जैसे कोई ख़्वाब आँखों को छूकर खो जाता है।

तारे हमें क्यों जुगनुओं-से दिखाई पड़ते हैं,
क्या आसमान में भी कहीं कोई ज़मीन होता है?

अब रास्ता बहुत सख़्त हो गया है अम्बर में,
शायद कोई परिंदा भी थककर लौट जाता है।

सड़क बदनाम बहुत है मेरे शहर की,
हर कदम पर कोई न कोई कहानी मिल जाती है।

लोग चलते तो हैं, मगर मन में डर लिए,
हर मोड़ पर जैसे भरोसा टूटता नज़र आता है।

बच्चियाँ डरी-डरी सी निकलती हैं घर से,
नज़रें झुकी रहती हैं, कदम धीमे पड़ जाते हैं।

हर मोड़ पर जैसे ख़ामोशी पहरा देती है,
जैसे रास्ते भी अब सवाल करने लगे हों।

कभी-कभी सोचता हूँ,
क्या गलती इन मासूम कदमों की है?

क्यों हर राह उन्हें डर के साए में ढँक देती है,
क्यों हर शाम शहर की आँखें झुका देती है।

काश कोई सुबह ऐसी भी आए,
जब बेटियाँ बिना डरे घर से निकलें,
और ये बदनाम सड़कें भी
फिर से भरोसे की राह बन जाएँ।

आर एस लॉस्टम

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