
अध्याय – 3
वन की पहली परीक्षा
मुनिवर की आज्ञा के अनुसार तंमंजये उसी कुटिया में रहकर उनके अधूरे कार्य को पूर्ण करने में लग गया। मुनि ने जाते समय उससे कहा था कि उनकी अंतिम इच्छा है—
जंगल के सभी प्राणियों के सहयोग से एक ऐसी सशक्त सेना का निर्माण, जिसमें बलवान और दुर्बल सभी समान रूप से सहभागी हों।
शेर, चीता, बाघ, हाथी, बंदर, भालू, जिराफ, हिरण, सियार, गीदड़, लकड़बग्घा, घोड़ा, भैंसा—कोई भी अलग न रहे।
तंमंजये पूरे मनोयोग से मुनि की इच्छा को साकार करने में जुट गया, परंतु जंगल और वहाँ रहने वाले प्राणियों से वह अपरिचित था। यही कारण था कि हर कदम पर उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।
कुछ पशु मुनि के सम्मान में उसकी सहायता कर रहे थे, किंतु कई ऐसे भी थे जो तंमंजये को पसंद नहीं करते थे—विशेषकर हाथी, बाघ, शेर, चीता, भालू, बंदर और भैंसा।
फिर भी तंमंजये मुनि के आदेश के प्रति पूर्ण निष्ठावान था। वह बिना किसी भय के, सत्य और ईमानदारी के साथ अपने कार्य में लगा रहा।
इसी क्रम में उसका सामना महाबली भैंसे से हुआ।
भैंसा और तंमंजये
भैंसा गरजते हुए बोला—
“तुम कौन हो, बालक? सुना है कि उस सनकी मुनि की बातों में आकर जानवरों की सेना बनाने चले हो। क्या यह संभव है? क्या शेर शिकार छोड़ देगा? क्या हिंसक पशु अहिंसा अपनाएँगे?”
तंमंजये शांत स्वर में बोला—
“आपने ठीक ही सुना है, सेनापति।”
भैंसा चौंका—
“सेनापति?”
“हाँ, सेनापति,” तंमंजये ने दृढ़ता से कहा।
भैंसा बोला—
“तुम मुझे सेनापति क्यों कह रहे हो, बालक?”
“क्योंकि हमारी सेना के सेनापति आप ही होंगे।”
भैंसा क्रोधित हो उठा—
“यह असंभव है! यहाँ से चले जाओ। यह जंगल खतरनाक है। और यदि तुम नहीं गए, तो सबसे पहले मैं ही तुम्हें मार दूँगा। मैं किसी जानवर का दुश्मन नहीं बनना चाहता।”
तंमंजये ने निर्भीक होकर कहा—
“मुझे कुछ नहीं होगा, सेनापति।”
“तुम इस जंगल को नहीं जानते,” भैंसा बोला।
“यहाँ ऐसे चतुर और भयानक जानवर हैं जो पल भर में प्राण ले सकते हैं। मुनि को भी तो एक आदमखोर ने ही मारा था।”
तंमंजये मुस्कराया—
“मैं अपने सेनापति को सेनापति नहीं कहूँ, तो और क्या कहूँ?”
भैंसा व्यंग्य से बोला—
“क्या तुम कोई देवता हो? या गंधर्व? आखिर कौन हो तुम, जो अपने प्राणों की चिंता नहीं करते?”
“न मैं देवता हूँ, न गंधर्व,” तंमंजये ने विनम्रता से कहा।
“मैं एक साधारण बालक हूँ, जो ऋषि-मुनि के वचनों का पालन करने का प्रयास कर रहा है।”
“आदमखोर शेर तुम्हें देखते ही खा जाएगा,” भैंसा बोला।
“मुझे कुछ नहीं होगा,” तंमंजये ने दृढ़ स्वर में कहा,
“क्योंकि आप मेरे साथ हैं, महाबली, और मुनिवर का आशीर्वाद भी।”
भैंसा कुछ क्षण मौन रहा। फिर बोला—
“उस आदमखोर को मारने के लिए सेना चाहिए।”
“नहीं,” तंमंजये ने कहा,
“उसे तो आप अकेले ही मार सकते हैं।”
“तो फिर सेना क्यों?” भैंसे ने पूछा।
“समय आने पर सब स्पष्ट हो जाएगा,” तंमंजये बोला।
“अभी हमें जंगल के सभी निवासियों से मिलना है। पर उससे पहले, यहाँ के राजा—शेर सिंह—से भेंट आवश्यक है।”
भैंसा असहज हो गया—
“शेर सिंह? वह मुझे पसंद नहीं करता।”
“तो आप ही बताइए, क्या किया जाए?” तंमंजये ने पूछा।
भैंसा गहरी साँस लेकर बोला—
“चलो, जंगल के राजा से मिलते हैं। पर सावधान रहना। रास्ते में लकड़बग्घों का क्षेत्र है।”
चलते-चलते भैंसे ने पूछा—
“तुम कौन हो, बालक? इतना साहस केवल राजपूतों में होता है।”
तंमंजये ने उत्तर दिया—
“मैं तिकडमगढ़ के महाराज रुपरांजये का छोटा पुत्र—तंमंजये हूँ।”
भैंसा झुक गया—
“क्षमाप्रार्थी हूँ, राजकुमार। मेरा सौभाग्य होगा कि मैं आपके काम आ सकूँ।”
तंमंजये ने मुस्कराकर कहा—
“मैं भी इस राज्य का नागरिक हूँ, महाबली। अधिकार हम दोनों का समान है।”
जंगल के राजा शेर सिंह
कुछ ही देर में वे जंगल के राजा शेर सिंह के क्षेत्र में पहुँच गए।
शेर सिंह गरजा—
“भैंसा! मेरे क्षेत्र में क्यों आया है?”
भैंसा झुका—
“प्रणाम, राजन।”
“क्या मृत्यु से डर समाप्त हो गया है?” शेर सिंह ने कहा।
“नहीं, राजन,” भैंसा बोला।
“मजबूरी हमें यहाँ लाई है।”
“क्या मजबूरी?” शेर सिंह ने पूछा।
“महाराज, इस बालक को आपकी सहायता चाहिए।”
तंमंजये ने हाथ जोड़कर कहा—
“प्रणाम, मामा।”
“मामा?” शेर सिंह चौंका।
“बचपन में माँ कहती थीं—जब संकट आएगा, शेर मामा बचाएँगे।”
शेर सिंह मुस्कराया, पर स्वर गंभीर था—
“तुम मेरे राज्य में खड़े हो, यह मत भूलो।”
“तो क्या अतिथि का स्वागत ऐसा होता है?” तंमंजये ने सहजता से कहा।
शेर सिंह कुछ क्षण सोचता रहा—
“बताओ, क्या सहायता चाहिए?”
“मैं एक योजना लेकर आया हूँ,” तंमंजये बोला।
“और चाहता हूँ कि आप हमारी सहायता करें।”
“योजना बताओ,” शेर सिंह ने कहा।
“मैं एक सेना बनाना चाहता हूँ,” तंमंजये बोला,
“और चाहता हूँ कि आप उसका संचालन करें।”
शेर सिंह हँसा—
“तुम बहुत बुद्धिमान हो, बालक।”
भैंसा बोला—
“तो क्या हम योजना पर चर्चा करें, राजन?”
शेर सिंह गंभीर स्वर में बोला—
“हाँ, महाबली। पर मेरे मन में एक संशय है।”
“क्या, मामा?” तंमंजये ने पूछा।
शेर सिंह मुस्कराया—
“बालक, तुम मुझे ‘मामा’ ही कहा करो। अच्छा लगता है।”
संवाद और कथा (संशोधित – मानवीय शैली में)
तंमंजये – आप जो चाहें कहें, मामा। अब तो आप मेरे मामा ही हैं।
शेर सिंह – यह सब संभव कैसे होगा, बालक? क्या गजराज मानेंगे? क्या हम लकड़बग्घों पर विश्वास कर सकते हैं? सियार, भालू, बंदर—क्या वे हमारा साथ देंगे? और वे असंख्य पशु जो हमसे भयभीत रहते हैं, क्या वे हम पर भरोसा करेंगे?
तंमंजये – जब आप मान गए हैं मामा, तो वे भी अवश्य मानेंगे।
शेर सिंह – मेरा स्वभाव अलग है, बालक। किंतु कुछ पशु स्वभाव से ही छलकारी होते हैं। वे सामने नहीं, पीठ पीछे वार करते हैं—विशेषकर लकड़बग्घे और गीदड़।
तंमंजये – आप मेरे साथ हैं मामा, और आप महाबली हैं। तब सब संभव है। हमें उनके मन से भय और तृष्णा निकालनी होगी। उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि हमें उनकी आवश्यकता है, और हम उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचाएँगे। यदि यह विश्वास जाग गया, तो वे स्वयं हमारे साथ आ खड़े होंगे।
शेर सिंह – आओ बालक, मेरे पास बैठो। अपनी योजना विस्तार से बताओ। मुझे क्या करना होगा?
तंमंजये – आपको बस इतना करना है मामा कि छोटे-बड़े सभी पशुओं से समान सम्मान के साथ बात करें। शेष कार्य मैं संभाल लूँगा।
शेर सिंह – ठीक है, चलो।
तिकड़मगढ़ से संदेश
उसी समय मुसकराज तिकड़मगढ़ से संदेश लेकर पहुँचे।
मुसकराज – राजकुमार, तिकड़मगढ़ पर पड़ोसी राजाओं ने चारों ओर से आक्रमण कर दिया है। इस युद्ध में महाराज रूपरांजये और राजमाता रीमवती को बंदी बना लिया गया है। आपके ज्येष्ठ भ्राता त्रयाश्रये वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं। राज्य में भारी विनाश हुआ है। लोग कह रहे हैं कि यह सब महाराज के सौतेले भाई धूर्तचंद की साजिश है। महाराज और महारानी पर अत्याचार का भय है। राजकुमार, अब शीघ्र निर्णय आवश्यक है।
यह सुनते ही तंमंजये मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़े। शेर सिंह, उनका परिवार, दरबारी पशु, मंत्री कालू बंदर और महाबली भैंसा—सभी घबरा कर उनकी ओर दौड़े।
कुछ ही क्षणों में तंमंजये को होश आया। अपने चारों ओर सभी को खड़ा देख वे चकित रह गए। सभी महाराज और राजमाता को मुक्त कराने की योजना बना रहे थे। यह दृश्य देखकर तंमंजये की आँखें भर आईं।
सभी एक स्वर में बोले—
“हम महाराज को अवश्य मुक्त कराएँगे। किसी भी शत्रु को नहीं बख्शेंगे।”
युद्ध की तैयारी
तंमंजये – मुसकराज, आप तुरंत तिकड़मगढ़ लौट जाइए। गुप्तचर बनकर सुरक्षित स्थान पर रहिए और समय-समय पर हमें वहाँ की स्थिति से अवगत कराते रहिए।
मुसकराज – जैसी आज्ञा, राजकुमार। क्या मैं महाराज को यह संदेश दूँ कि आप शीघ्र उन्हें मुक्त कराने आ रहे हैं?
तंमंजये – निस्संकोच। माता श्री से भी अवश्य मिलना। अब शीघ्र प्रस्थान करो।
सेना गठन का कार्य युद्ध-स्तर पर आरंभ हो गया। शेर सिंह ने अपने राज्य के सभी पशुओं को एकत्र होने का आदेश दिया और पड़ोसी वनों को भी सहयोग का संदेश भेजा। महाबली को सैनिकों के प्रशिक्षण का भार सौंपा गया।
आदमखोर शेर से युद्ध
अभ्यास के दौरान ही अचानक पीछे से तंमंजये पर प्रहार हुआ। वह वही आदमखोर शेर था जिसने मुनिवर की हत्या की थी। शेर सिंह और तंमंजये ने मिलकर उसका सामना किया।
यह युद्ध सात दिनों तक चला। धरती बंजर हो गई। अंततः महाबली भैंसे के प्रचंड प्रहार से आदमखोर शेर पराजित हुआ।
शेर सिंह – वह दुष्ट था, पर योद्धा भी था। उसने योद्धा की भाँति युद्ध किया और मृत्यु भी उसी प्रकार पाई। मेरा आदेश है कि उसका अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक किया जाए। उसकी स्मृति में यह संदेश अंकित किया जाए—
“बुराई चाहे जितनी शक्तिशाली हो, उसका अंत निश्चित है।”
धूर्त शेर और अदनी का संवाद
आदमखोर शेर की मृत्यु का समाचार उसके पुत्र धूर्त शेर तक पहुँचा।
धूर्त शेर – मेरे पिता को किसने मारा?
जब उसे सत्य ज्ञात हुआ, तो उसकी माता अदनी ने कहा—
अदनी – यह दुखद समाचार है, पर साथ ही यह भी सत्य है कि अब जंगल में रक्तपात समाप्त होगा। भय का अंत होगा। शांति और सौहार्द लौटेगा।
धूर्त शेर – माता! आप उनके विरुद्ध कैसे बोल सकती हैं?
अदनी – पुत्र, वे मेरे पति थे, इसलिए ही सत्य कह रही हूँ। क्या किसी को मारने, समाज को आतंकित करने का अधिकार किसी को है? एक नारी होकर मैं विरोध नहीं कर सकी—क्योंकि यह समाज स्त्रियों को बोलने नहीं देता।
हम नारी सदा दबाई जाती हैं—कभी पति के नाम पर, कभी पुत्र के नाम पर। तुम्हारे पिता नरभक्षी बन चुके थे। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु पर क्या मैं शोक मनाऊँ
अदनी और धूर्त शेर का संवाद (मानवीय रूप)
अदनी – नहीं पुत्र, न विलाप करना चाहिए और न शोक। आज तो उत्सव मनाना चाहिए। क्योंकि आज से हमारे राज्य की प्रजा और पड़ोसी राज्यों की प्रजा निडर होकर जी सकेगी। वे सुरक्षित होंगे।
धूर्त शेर – फिर भी माता, वे हमारे पिता थे… और आपके पति।
अदनी – पुत्र, ऐसा नहीं कि मुझे उनके जाने का दुःख नहीं है। परंतु मुझे इस बात की अधिक खुशी है कि अब प्रजा के मन में शांति की एक नई लहर उठेगी।
राजा के लिए पहले राज्य और प्रजा होती है, फिर स्वयं का सुख। क्या आदमखोर भी ऐसा सोचते थे?
धूर्त शेर – फिर आज आप यह सब क्यों कह रही हैं, माता?
अदनी – इसलिए, धूर्त, क्योंकि तुम मेरे पुत्र हो। वर्षों से जो पीड़ा मैं अपने हृदय में दबाए बैठी थी, वह आज तुम्हें कह पा रही हूँ।
तुम्हारे पिता का आतंक केवल बाहर ही नहीं था, अपनों के लिए भी था। हमारे लिए भी। उनका व्यवहार मित्र और शत्रु में कोई भेद नहीं करता था।
और पुत्र, ऐसा कौन था जो उनके विरुद्ध खड़ा होने का साहस करता?
धूर्त शेर – फिर भी माता, वे मेरे पिता थे। मेरा कर्तव्य है कि मैं उनके हत्यारे से बदला लूँ।
अदनी – नहीं धूर्त, बदला लेना गलत होगा। तुम अपने पिता के मार्ग पर मत चलो।
वे शिकार करने गए थे और स्वयं शिकार बन गए। इसमें बदले की बात कहाँ है?
धूर्त शेर – नहीं माता, मैं उनके रास्ते पर नहीं चलूँगा। मैं केवल उनके अपराधी को दंड दूँगा। उसके बाद किसी को कोई हानि नहीं पहुँचाऊँगा।
अदनी – नहीं धूर्त, वे इस योग्य नहीं थे कि उनके लिए बदला लिया जाए।
धूर्त शेर – माता, मैं बस इतना जानता हूँ कि वे मेरे पिता थे। पुत्र होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है। कृपया मुझे रोकने का प्रयास न करें।
अदनी – मैं तुम्हें नहीं रोक रही, पुत्र। मुझे ऐसा अधिकार भी नहीं है।
मैंने अपना पूरा जीवन भय के साए में बिताया है। अब आगे भी शायद यही भाग्य है।
जो तुम उचित समझो, वही करो—पर इसका परिणाम गलत होगा।
धूर्त शेर – मैं जानता हूँ, माता। संभव है मैं भी मारा जाऊँ।
अदनी – फिर यह हठ क्यों, धूर्त? तुम मेरे एकमात्र पुत्र हो। मेरी बात मान लो।
धूर्त शेर – क्योंकि यदि मैं ऐसा न करूँ, तो संसार मुझ पर उँगली उठाएगा। लोग मुझे कायर कहेंगे।
इसलिए, माता, मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं अपने निर्णय पर चल सकूँ।
अदनी – मैं तुम्हें विजय का आशीर्वाद नहीं दे सकती, धूर्त।
पर तुम्हारी दीर्घायु की कामना अवश्य करूँगी।
इतना याद रखना पुत्र—इस पुरुषप्रधान समाज में स्त्री के रक्षक दो ही होते हैं: पति या पुत्र।
पति मैं खो चुकी हूँ… तुम्हें खोना नहीं चाहती।
इतना कहकर अदनी वहाँ से चली जाती है।
तिकड़मगढ़ का युद्ध
उधर महाबली, शेर सिंह और तंमंजये सैनिकों को एकत्र कर तिकड़मगढ़ पर चढ़ाई की तैयारी में जुट गए।
महाराज और राजमाता को मुक्त कराना पहली प्राथमिकता थी—और राज्य को पुनः प्राप्त करना भी।
यह युद्ध इतिहास में अनोखा होने वाला था—क्योंकि यह केवल मनुष्यों का नहीं, बल्कि मनुष्यों और पशुओं का संयुक्त युद्ध था।
यह विचारों का नहीं, बल्कि शक्ति बनाम शक्ति का संग्राम था।
इस युद्ध के केंद्र में थे—महाराज रूपरांजये और तिकड़मगढ़।
तंमंजये – महाबली, क्या हम आक्रमण के लिए तैयार हैं?
महाबली – हाँ राजकुमार। बस आपके आदेश की प्रतीक्षा है।
तंमंजये – मामा शेर कहाँ हैं?
महाबली – वे सैनिक टुकड़ी के साथ पहले ही तिकड़मगढ़ के लिए निकल चुके हैं।
उन्होंने संदेश भेजा है—आज का जलपान महाराज और राजमाता के साथ होगा, शत्रुओं को परास्त करने के बाद।
तंमंजये – तब चलिए, महाबली।
“जय भवानी! जय महाकाल!” के घोष से पूरा वन गूँज उठा।
महाबली के कदमों की गड़गड़ाहट से धरती काँप उठी।
कुछ ही समय में तंमंजये की सेना तिकड़मगढ़ में प्रवेश कर चुकी थी।
एक ओर मामा शेर, दूसरी ओर महाबली—और मध्य में तंमंजये।
शत्रु सेना भय से टूट गई।
कुछ भागे, कुछ मारे गए, कुछ बंदी बना लिए गए।
अंततः विजय हुई।
महाराज और राजमाता मुक्त हुए।
पिता–पुत्र का मिलन
महाराज – पुत्र! तुम आ गए! अब तुम मेरे पास ही रहोगे।
तंमंजये – पिता श्री, अभी मुनिवर द्वारा दिया गया कार्य शेष है।
जब भी आप स्मरण करेंगे, मैं आपके समीप उपस्थित रहूँगा।
महाराज – मुझे तुम्हारी चिंता रहती है, पुत्र।
तंमंजये – मैं कुशल हूँ, पिता श्री। मामा शेर और काका महाबली मेरा उतना ही ध्यान रखते हैं जितना आप।
महाराज की इच्छा पर शेर सिंह और महाबली का परिचय हुआ।
राजमाता ने सबको आशीर्वाद दिया।
अगले दिन—
तंमंजये – अब हमें विदा लेनी चाहिए।
दरबार में सभी ने महाराज से अनुमति ली।
महाराज – पुत्र, राज्य को युवराज की आवश्यकता है।
तंमंजये – पिता श्री, जब उचित समय आएगा, मैं स्वयं लौट आऊँगा।
और इस प्रकार तंमंजये अपने साथियों के साथ अपने पथ पर आगे बढ़ गया।
आर एस लॉस्टम










