
नारी सीमित नहीं है अब,
रसोई की दहलीज़ तक,
गूँज रही है आवाज़,
हर दिशा, हर महफ़िल तक।
वो 21वीं सदी की नारी है,
पहचान उसकी सब पर भारी है।
किताबों से उसने ज्ञान लिया,
और हाथों में मशाल थाम लिया।
नज़रें झुकी नहीं अब,
वो नज़रें मिलाती है,
हर चुनौती, हर बंधन को,
हँसकर ठुकराती है।
अंतरिक्ष की ऊँचाइयों से,
ज़मीं की गहरी नींव तक,
उसकी मेहनत की खुशबू,
फैली है हर जीव तक।
वो माँ भी है, बहन भी है,
दोस्त और हमसफ़र भी है,
पर इन सबसे पहले,
वो खुद की राह पर मुस्तफ़र भी है।
तकनीक की दुनिया में,
वो रखती है अपनी धाक,
कंप्यूटर की स्क्रीन हो,
या खेत की उपजाऊ राख।
सपनों के पर लेकर,
वो ऊँचा उड़ना जानती है,
टूटे हुए रिवाजों को,
अब वो नहीं मानती है।
संस्कृति की जड़ों से जुड़ी,
पर विकास की है प्यास,
आत्मनिर्भरता का दीपक,
जलता है उसके पास।
साड़ी में भी सजी है,
और कोट-पैंट भी पहनती हैं,
फैसला उसका अपना है,
वो किसी से नहीं डरती है।
शक्ति, स्नेह, साहस का,
अद्भुत है संगम,
वो भारत की बेटी है,
वो किसी से नहीं है कम।
रीना नाम को पलट कर पढ़ लो,
एक नारी निकल कर आएगी,
21वीं सदी की दहलीज पर
अपना परचम लहराएगी।।
नारी सीमित नहीं है अब,
रसोई की दहलीज तक।
गूंज रही है आवाज,
हर दिशा हर महफिल तक।
वो 21वीं सदी की नारी है,
पहचान उसकी सब पर भारी है।
रीना पटले (शिक्षिका)
सिवनी (मध्य प्रदेश)










