Uncategorized
Trending

“पत्नी __गृह लक्ष्मी”

वंदन होता जहां ज्योति का ,
रहता अमर प्रकाश वहीं ।
जहां नारियों का पूजन है,
देवों का आवास वहीं ।।

गृह लक्ष्मी के चरण जहां हैं,
ममता का मधुमास वहीं ।
करुणा, समता, शुचिता, मृदुता,
प्रभुता का आभास वहीं ।।

घरघर मिलती दिव्यभावना,
क्षमा, शांति नारी से ही।
सुख के सुमन और फल मिलते,
केवल इस क्यारी से ही।।

पत्नी है वह स्रोत, जहां से,
स्रवित सदा समरसता है।
पत्नी है वह सूत्रधार,
जिससे घर , घर सा लगता है।।

बाद, पितामाता के कोई, यदि जीवन मे रिश्ता है। तो वह पतिपत्नी का है,
जो जनम_जनम तक चलता है।।

पत्नी है वह प्रकृति जहां पर,
कुसुम मनोहर खिलते हैं।
मुदित, मधुर, मंगलमय जीवन,
के फल ,रस_मय मिलते हैं।।

धर्म, कर्म मे, ब्रतनिष्ठा से, पति का साथ निभाती है। स्नेहसुधा का दीप जलाकर,
पति को राह दिखाती है।।

पत्नी ही माता बनकर के,
पति का वंश चलाती है।
कन्या दान पुनीत कृत्य,
करवाने का यश पाती है।।

बचपन से जाने कितने,
सपनों के महल सजाती है।
पति, पति गृह, अनुकूल मिले,
सब देवी, देव मनाती है ।।

सुता, बहन के फर्ज निभाकर,
पत्नी बनकर आती है।
अनजाने घर मे आकर,
घुलमिल, रम, रचबस जाती है।।

जिन रिश्तों मे बाल्यकाल से,
युवा अवस्था तक रहती।
उनको सीमित कर पतिगृह मे,
अपना सब अर्पण करती।।

तपती तरुणाई को देती,
छाया प्रेम लता बनकर।
विश्वाशी मित्रों जैसी,
सुखदुख की कथाव्यथा बनकर।।

धैर्य धरा सा है उर मे,
नभ सी विशालता चिंतन मे।
संघर्षों का, बलिदानों का,
परिचय देती दुर्दिन मे।।

पत्नी तो त्यागों मे लिपटी,
पावन,करुण कहानी है।
बचपन है, पीहर के हित,
पति गृह हित पूर्ण जवानी है।।

सब कुछ उसका औरों का,
अपना आंखो का पानी है।
सोचो उससे बढ़कर क्या ?
जग मे कोई बलिदानी है !

कुछ पति अपनी पत्नी से,
व्यवहार क्रूरतम करते हैं।
डॉटडपट,गालीगलौज कर,
मार_पीट भी करते हैं।।

पति के परिजन, इस कुकृत्य मे,
उसका साथ निभाते हैं।
जेठ, ननद, जेठानी, देवर,
सास, ससुर मिल जाते हैं।।

ऐसे मे बेचारी पत्नी,
अबला ही रह जाती है।
किससे कहे ? कहां जाये ?
बस कठपुतली बन जाती है।।

कुछ पत्नियां, आधुनिक रंग मे,
खुद को ऐसे ढाल लिया।
नीति, नियम, मर्यादा, का,
मन माना अर्थ निकाल दिया।।

तिल का ताड़ बनाती हैं,
राई का पर्वत करती हैं।
बात_बात मे पीहर जाने,
मर जाने को कहती हैं।।

रोनाधोना, उठापटक कर,
त्रिया चरित्र दिखाती हैं।
फूट डालकर, सास, ससुर को,
वृद्धाश्रम भिजवाती हैं।।

सभ्य समाज बनाने मे,
ये दोनो बातें अनुचित हैं।
पतियों की ज्यादतियां,
पत्नी की स्वछंदता अनुचित है।।

पति_पत्नी मे से कोई भी,
छोटे, बड़े नहीं होते।
दोपहिया गाड़ी के चक्के,
छोटे, बड़े नहीं होते।।

आओ अपनी भूल सुधारें,
शाश्वत का आह्वान करें।
सद गृहस्थ बन कर गृहस्थ,
आश्रम का गौरव गान करें।।

पति, पत्नी दोनो मिलजुल कर, जीवन पथ निर्माण करें। एकदूसरे की गरिमा का,
ध्यान रखें, सम्मान करें।।

डा शिव शरण श्रीवास्तव “अमल”

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *