
आज नारी सिर्फ नारी है,
देवी का अवतार नहीं।
अग्नि परीक्षा दे जो चुपचाप,
आज नारी वह सीता नहीं।।
करती है वो प्रश्न भी,
और करती प्रतिकार भी।
जुए में दांव पर जो लग जाए,
आज नारी वह द्रोपती नहीं।।
उठाती आवाज खुद के लिए,
बेवजह सजा स्वीकार्य नहीं।
मर्यादा की जंजीरों में जकड़ी,
पत्थर बन पड़ी अहिल्या नहीं।।
अन्याय देख जो मौन रहे,
नारी इतनी लाचार नहीं।
सही राह दिखलाती आज वह,
आंखों पर पट्टी बांधे गांधारी नहीं।।
जीवन की राह चुने वह खुद,
अब वह रही लाचार नहीं।
नारी केवल नारी है,
उसे किसी उपमा की दरकार नहीं।।
डॉ. दीप्ति खरे,
मंडला(मध्य प्रदेश)










