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स्वाधिष्ठान चक्र

।। साधना पथ ।।
२. स्वाधिष्ठान चक्र—
{Hypogastric Plexus}

चक्र स्थान– नाभि से तीन इंच नीचे स्थित है। मूलाधार चक्र से दो अँगुल ऊपर पेडू के पास इस चक्र का स्थान है ।
इसे अधरांत्रिक भी कहते है ।।

आकृति– सिंदूरी रंग के प्रकाश से प्रकाशित छह पंखुड़ी {दलों} वाले कमल के समान है ।।

केन्द्र काम शक्ति का केन्द्र।

तत्त्व बीज– वं
तत्त्व बीज का वाहन, मकर, जिसके ऊपर वरूण विराजमान है ।।

तत्त्व– जल तत्त्व की गति नीचे की ओर लंबी ।।

गुण– रस ।।

मंत्र की व्याहृति– ओ३म् तपः
।।

शक्ति का नाम– तपः शक्ति, यह शक्ति आज्ञा चक्र पर भी होती है ।।

रंग– नारंगी तथवा सिंदूरी रंग का षट्दल कमल स्वाधिष्ठान का प्रतीक है ।।

वायु स्थान— सर्व शरीर में व्यापक होकर गति करने वाले व्यानवायु का मुख्यस स्थान है ।।

संस्कृत शब्द– वं, भं, मं, यं रं, लं ।।

लोक: भुवः है ।।

अधिपति देवता : विष्णु ।।

यंत्र अर्धचंद्राकार, श्वेत रंग ।।

ज्ञानेन्द्रिय: स्वाद लेने की शक्ति रसना का स्थान है ।।

संबंधित अंग दोनों पैर, जनन ग्रंथि और प्रजनन करने वाले अंग ।। गोनेडश्र ग्रंथि से संबंधित यह चक्र सेक्स ऊर्जा, भावना एवं उद्गार का केन्द्र है ।।

ध्यान इस स्थान पर छः दल वाले कमल का अध्यापन किया जाता है ।।

चक्र जगाने हेतु स्वाधिष्ठान को जगाने के लिए जल तंत्र के यंत्र पर त्राटक का अभ्यास करना चाहिए। दूसरा उपाय है कि रात्रि के समय अर्धचंद्र पर दृष्टि केंद्रित करने का अभ्यास करें। चक्र पर ध्यान करने का फल सूजन, पालन और निधन में समर्थता तथा जिव्हा पर सरस्वती का होना। साथ ही यह निम्न अंगों को प्रभावित करता है—

१. छोटी आँत ।।

२. बड़ी आँत ।।

३. एपेडिक्स ।।

४. प्रजनन संबंधी अंग ।।

५. यह सामान्य शक्ति का केंद्र है ।।

६. यह सेकेंडरी नेबल चक्र को भी प्रभावित करता है ।।

७. दर्शन शक्ति के विकास में सहायक तथा चेतना के उच्च द्वारों को खोलने में समर्थभावनात्मक तरंगों के आगमन का द्वार ।।

८. इस चक्र की सक्रियता से लोगों के प्रभामंडल के संबंध में तथा उनकी चेतना की तरंगों के संबंध में अनुभव करने में आसानी होती है। उच्च शक्तियों से संबंध स्थापित करने में सहायता मिलती है ।।

चक्र के विकारग्रस्त होने से हानियाँ–
स्वाधिष्ठान चक्र के विकारग्रस्त होने की स्थिति में निम्नांकित रोग हो जाते हैं—
१. कब्ज रोग
२. भोजन के पोषक तत्त्वों की ग्रहणशीलता की कमी ।
३. एपेंडीसाइटिस ।
४. आंत संबंधी बीमारियाँ ।
५. प्रजनन संबंधी कठिनाइयाँ ।
६. नीचे के चक्र में असंतुलन ।
७. थकान का अनुभव ।
८. अधिक अहंकार केंद्रित होना ।
९. दिवा स्वप्न ।
१०. भूख को रोकने की असमर्थता ।
११. आलस्य वृद्धि ।
१२. जानने की इच्छा का अभाव ।
१३. मूत्र संबंधी रोग ।
१४. आँतों के रोग ।
१५. श्वांस के रोग ।
हरिकृपा ।। मंगल कामना ।।
संकलन व प्रेषण— पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार

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