
‘ ।।साधना पथ ।।
‘४.
Cardiac Plexus
चक्र स्थान– वक्षः स्थल के मध्य और हृदय के निकट । यह चक्र थाइमस ग्रंथि से संबंधित है। इसे हत चक्र भी कहते हैं । जीवात्मा का निवास इसी स्थान पर माना गया है ।।
संबंधित अंग– हृदय, फेफड़े, हृदय एवं रक्तचाप । यह चक्र हृदय, फेफड़ों, लीवर तथा रक्त प्रवाह पद्धति से जुड़ा होने के कारण बहुत ही महत्त्व का है ।।
तत्त्व– वायु, धूम्र रंग, षट्कोणाकार, वायु तत्त्व मुख्य स्थान है । यह चक्र वायु तत्त्व प्रधान है ।।
मंत्र की व्याहृति– ओ३म् महः ।।
संस्कृत के १२ शब्द कं, खं, गं, घ, ङ, चं, छं, जं, झ, ञ, टं, ठं।
शक्ति का नाम– महः शक्ति ।।
रंग– चमकदार हलका हरा ।।
आकृति– सिंदूरी रंग के प्रकाश के उज्ज्वलित बारह पंखुड़ी {दलों} वाले कमल के सदृश ।।
गुण– स्पर्श ।।
तत्त्व बीज– यं ।।
यंत्र– षट्कोणाकार, धूम्र रंग ।।
अधिपति देवता– ईशान व रूद्र ।।
लोक– महः लोक है ।
यह अंतःकरण का मुख्य स्थान है ।।
ज्ञानेंद्रिय– स्पर्श तन्मात्रा से उत्पन्न स्पर्श की शक्ति त्वचा का केन्द्र है ।।
कर्मेंद्रिय– वायु तत्त्व से उत्पन्न पकड़ने की शक्ति हाथ का स्थान है ।।
तत्त्व बीज का वाहन– मृग ।।
वायु स्थान– मुख और नासिका से गति करने वाले प्राणवायु का मुख्य केंद्र है ।।
तत्त्व बीज की गति तिरछी गति है ।।
चक्र पर ध्यान करने का फल–
इस चक्र पर ध्यान से सक्रिय होने वाले अंगों के साथ इससे संबंधित भावों को भी सम्मिलित किया जा रहा है ।।
१. हृदय जो अनाहत ध्वनि का स्थान भी है ।
२. थायमस ग्लैंड ।
३. रक्त परिभ्रमण संबंधी अंगों की क्रियाशीलता ।
४. रक्तवाहिनियों की क्षमता ।
५. स्पर्श भाव ।
६. दूसरों के प्रति स्वीकार भाव ।
७. विश्वास ।
८. आत्म स्वीकृति का भाव ।
९. प्रेम और करूणा का भाव, कवित्व शक्ति ।
चक्र के विकारग्रस्त होने से हानियाँ– चक्र की क्रियाशीलता के अभाव में निम्न रोगों की उत्पत्ति होती है ।।
१. हृदय संबंधी रोग ।
२. रक्त परिभ्रमण संबंधी कठिनाइयाँ ।
३. निम्न जीवनी शक्ति ।
४. हिस्टीरिया ।
५. जलन, घृणा ।
६. दमा ।
७. तपेदिक ।
८. फेफड़े संबंधी परेशानियां ।
९. ऊर्जा का अभाव ।
१०. एकाकीपन ।
११. मानसिक अस्थिरता का भाव ।
१२. आत्म स्वीकृति और आत्मसम्मान का अभाव ।
१३. असन्तोष ।
१४. निराशा, हीनता, भय आदि का बढ़ना ।
हरिकृपा ।।
संकलन व प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार ।।











