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५- विशुद्धि चक्र


‘ Carotid Plexus

चक्र स्थान– कंठ के पीछे सुषुम्ना नाड़ी में स्थित, रीढ़ के भीतर यह थायराइड ग्रंथि से संबंधित होता है । यह गला ओर फेफड़ों से जुड़ा होता है । यह अत्यंत संवेदनशील चक्र है एवं प्राण ऊर्जा के वितरण का प्रमुख केंद्र है ।

रंग– समुद्री नीला ।

आकृति– धुंधले रंग के प्रकाश से प्रकाशित १६ पंखुड़ी {दलों} वाले कमल जैसी ।

केन्द्र– अपनी अभिव्यक्ति तथा मनोभावों को दूसरों तक पहुँचाने का केन्द्र ।

अधिपति देवता– पंच मुख वाले सदाशिव ।

अक्षर अं, आं, इं, ई, उ, ऊ, ऋ, लं, लू, एं, ऐ, ओ, औं, अं, अः ।

ध्यान– १६ दलों वाले कमल का ध्यान ।

सिद्धियां– वाणी पर प्रभाव । नाभि चक्र से उठा ‘परा’ नामक अव्यक्त शब्द वैखरी रूप से इसी चक्र में स्फुट होता है ।

लोक– जनः है ।
तत्त्व बीज का वाहन हस्ती, जिसके ऊपर प्रकाश देवता आरूढ़ है ।

तत्त्व– आकाश ।
चित्र विचित्र आकार तथा नाना रंग वाले अथवा पूर्ण चंद्र के सदृश गोलाकार आकाश तत्त्व का मुख्य स्थान है ।

तत्त्व बीज– हं है ।
यहाँ पर वायु तत्त्व प्रधान उदान प्राण का वास भी है । सप्त स्वर इसी से
प्रकट होते हैं ।

ग्रंथियां– थायराइड और पैरा-थायराइड ।
कंठ कूप में संयम करने से भूख-प्यास की निवृत्ति होती है ।

मंत्र की व्याहृति– ओ३म् स्वः ।

शक्ति का नाम– स्वः शक्ति।
यह विशुद्धि च और मणिपूर चक्रों में भी होती है ।

गुण– शब्द है ।

वायु स्थान– ऊपर की गति का हेतु तथा शरीर पर्यन्त अवस्थित उदान वायु का मुख्य स्थान है ।

कर्मेन्द्रिय– आकाश तत्त्व से उत्पन्न वाक्-शक्ति वाणी का स्थान है ।

ज्ञानेंद्रिय– शब्द तन्मात्रा से उत्पन्न श्रवण-शक्ति स्त्रोत का स्थान है ।

चक्र पर ध्यान करने का फल–

इस प्रकार ध्यान करने से निम्न लाभ होते हैं ।।
१. महाज्ञानी, शांतचित्तत्ता, शोकरहितता तथा दीर्घ जीवन आदि ।

२. यह हमारे कंठ प्रदेश को ऊर्जा प्रदान करता है ।

३. टांसिल, वायस वाक्स, विंड पाइप, थायराइड ग्लैंड, पैरा-थायराइड ग्लैंड, लिम्पेथेटिक सिस्टम, एसोफेगस आदि अंगों से इसका विशेष संबंध होता है ।

४. यह वाणी विकास एवं श्रवण शक्ति दोनों में सहायक है ।

५. यह चेतना को अचेतन, मन से संबंधित करने में बहुत सहायक होता है ।

६. तिल्ली की क्रियाशीलता को प्रभावित करना ।

७. इसका सहस्रार चक्र पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है ।

चक्र के विकारग्रस्त होने से हानियाँ —

इसमें कार्यशीलता का ह्रास होने पर निम्न प्रकार के रोगों की उत्पत्ति हो जाती है ।।

१. गले संबंधी रोग। आवाज का स्पष्ट न होना ।

२. रोगों से लड़ने की क्षमता का कम होना ।

३.दमा ।

४. थायराइड और पैरा-थाराईड संबंधी समस्याएं, जैसे शारीरिक लम्बाई का अधिक या कम होना ।

५. अधिक आत्म केन्द्रित होना तथा अपने आपसे बातचीत करने का मनोरोग ।

६. ईमानदारी का अभाव ।

७. श्रवण-शक्ति क्षमता का ह्रास ।

८. वाक् शक्ति में कमी ।

९. भावों और विचारों को प्रकट करने की अनिच्छा और भावों को दमन करने की प्रवृत्ति ।

१०. अध्ययन अथवा अध्यापन की रूचि में कमी ।
हरिकृपा ।।
संकलन व प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार ।।

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