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७. सहस्रार चक्र

चक्र स्थान– सिर के ऊपरी भाग में स्थित {चोटी के नीचे} तालू के ऊपर मस्तिष्क में ब्रह्म रंघ से ऊपर सब शक्तियाँ का केन्द्र है ।।

रंग– भूरा या मटमैला, गहरा जामुनी ।

केन्द्र– आध्यात्मिक साधना का केन्द्र, उच्चतम ज्ञान और चेतना का स्थान है ।।

ध्यान– एक हजार पंखुड़ियों वाले सहस्र दल कमल पर ।

तत्त्व बीज– विसर्ग है ।

तत्त्व बीज गति– बिन्दु है ।

सिद्धियां– परमात्मा की परमशक्ति का अनुभव तथा आनंद की उपलिब्ध ।।

तत्त्व– तत्त्वातीत है ।

ग्रंथि– पीनियल ग्रंथि से संबंधित है ।

मंत्र की व्याहृति– ओ३म् भूः ।

शक्ति का नाम– भूः शक्ति ।

लोक– सत्यम् है ।

अधिपति देवता– परब्रह्म अपनी महाशक्ति के साथ ।

यंत्र– पूर्ण चंद्र, शुभ्र वर्ण ।

विशेष– यह चक्र कुंडलिनी का अंतिम पड़ाव है । जब कुंडलिनी ऊर्जा मूलाधार से ऊपर उठती हुई अन्य चक्रों के माध्यम से सहस्रार चक्र में प्रविष्ट होती है, तब व्यक्ति अध्यात्म की चरम सीमा पर जा पहुँचता है । यह चक्र ऊपरी दिमाग तथा दाहिनी आँख से जुड़ा हुआ है । यह बात स्मरण रखने की है कि इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ चक्रों के बीच एक-दूसरे को काटती हुई ऊपर की ओर उठती है ।।

चक्र पर ध्यान करने का फल, मुक्ति ।। इस स्थान पर प्राण तथा मन के स्थिर हो जाने पर सर्ववृत्तियों के निरोध रूप असंप्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है। संबंधित अंग जिनकी क्रियाशीलता इस चक्र पर ध्यान से बढ़ती है ।।
जो निम्न प्रकार है—

१. पीनियल ग्रंथि ।

२. मस्तिष्क ।

३. मुख्य प्रवेश बिंदु — आध्यात्मिक ऊर्जा का

४. प्रज्ञा, जागरूकता, आध्यात्मिक अनुभवों, ध्यान, समाधि का मुख्य केन्द्र ।

५. उच्चतम चेतना शिखर ।

६. वायलेट रंग की प्राण ऊर्जा के आगमन का प्रमुख केन्द्र ।

७. कुंडलिनी शक्ति का अंतिम छोर ।

८. ब्रह्मांडीय चेतना से संपर्क का सशक्त माध्यम ।

चक्र के विकारग्रस्त होने से हानियाँ — सहस्रार चक के विकारग्रस्त होने से निम्न हानियाँ हो सकती हैं ।।

१. मस्तिष्क संबंधी बीमारियाँ ।

२. पीनियल ग्रंथि संबंधी बीमारियाँ ।

३. मानसिक अस्थिरता और मानसिक बीमारियाँ ।

४. जीवन शक्ति में ह्रास ।

इस प्रकार उपरोक्त सातों चक्रों का हमारे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है । इनकी क्रियाशीलता में हमारे समृद्ध और स्वस्थ जीवन का सारा राज छिपा है । यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति को इन चक्रों के संबंध में व्यापक जानकारी होनी चाहिए ।।

विशेष– इन ७ चक्रों के साथ-साथ योग ग्रंथों में तीन ग्रंथियों का भी वर्णन मिलता है। इनके नाम हैं- ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु ग्रंथि और रूद्ध ग्रंथि । कुंडलिनी साधना में इनको भेदन करना जरूरी है । मूलाधार चक्र भेदन के पूर्व ब्रह्म ग्रंथि का भेदन किया जाता है । इसके बाद विष्णु ग्रंथि का मणिपूर व अनाहत में तथा रूद्र ग्रंथि का विशुद्धि चक्र और आज्ञा चक्र में भेदन करना चाहिए ।।
ये ग्रंथियाँ वस्तुतः हमारी चेतना के अवरोध बिन्दु हैं, जिन्हें साधना में भेदन करना जरूरी होता है । शिव संहिता में इनके बारे में विशद व्याख्या की गई है ।।

मेजर चक्र — उपरोक्त ७ चक्रों को योग ग्रंथों में महत्त्व दिया गया है। प्राणिक हीलिंग में इनकी संख्या ११ बताई गई है और इन्हें मेजर चक्र कहा गया है। इनके नाम है —
१- बेसिक चक्र २- सेक्स चक्र ३- मेंग-मेन चक्र ४- नेवल चक्र ५- स्पलीन चक्र ६- सोलर प्लेक्सस चक्र ७- हार्ट चक्र ८- थ्रोट चक्र ९- आज्ञा चक्र १०- फोरहेड चक्र ११- क्राउन चक्र ।।
किन्हीं ग्रंथों में सूक्ष्म चक्रों की संख्या ८०० से भी अधिक तथा मुख्य सूक्ष्म चक्रों की संख्या १०९ बताई गई है ।।

माइनर चक्र– माइनर चक्र २१ माने गए हैं, जिनका डायमीटर १ से २ इंच तक होता है । इनका विवरण निम्न प्रकार से है —

माइनर चक्रों की स्थितियाँ–
२ माइनर चक्र कान के सामने की ओर, जहाँ पर जबड़े की हड्डी मिलती है ।
२ माइनर चक्र दोनों छातियों के ठीक ऊपर भाग में । १ चक्र जहाँ छाती की हड्डी थायराइड ग्रंथि के समीप अवस्थित होती है । २ चक्र दोनों हाथों की हथेलियों में । २ चक्र प्रत्येक दोनों पैरों के तलवों में। २ चक्र आँखों के ठीक पीछे । १ चक्र गोनेड्स से संबंधित । १ चक्र लीवर के पास । १ पेट से संबंधित । २ चक्र प्लीहा से संबंधित । २ चक्र प्रत्येक घुटने के पिछले भाग में । १ चक्र बेगस नर्व से जुड़ी तथा थायमस ग्रंथि के निकट । चक्र सोलर प्लेक्सस के निकट । इस प्रकार इनकी कुल संख्या २१ कही गई है ।।
हरिकृपा ।।
संकलन व प्रेषण—
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार ।।

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