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भावों की सरिता कविता

जब भी शब्द रूप ले बहती मन के भावों की सरिता है,
अभिव्यक्ति को मायने देती विचारों की संयोजिता है,
कोरा कागज़ भी भीग पड़े अंतस की निर्मल धारा में,
अनुप्राणित शब्दों से भावों को जो संजोती कविता है !

ह्रदयांचल की श्रद्धा जब प्रार्थना में बदल जाती है,
आशाओं की नई सुबह से घनघोर निशा ढल जाती है,
संवेदनाओं के अनकहे आभूषण से जो श्रृंगारित होती,
ईश्वर को समर्पित आस्था का प्रवाह कविता कहलाती है!

टूटे अरमानों के ख़ामोशी शब्दों में गुंजित होती है,
अंतर्मन के अंतर्द्वंद्व की गिरह इक इक कर खुलती है,
कभी नाखुनों सी चुभे कभी उंगलियों का सहारा दे,
तिरोहित वेदना को अलंकृत करते अश्रु कविता बहती है!

एकांत में मिलती है कविता आंगन में गुमसुम रहती है,
कभी सरपट दौड़ती कभी घड़ी भर को थम जाती है,
ऊंची चढ़ाई चढ़ती है कभी गहराइयों में उतरती है,
पेड़, गौरैया, नदी, बरसातें कविता में घुल जाती है !

चुनौती और प्रेम का इक पर्याय भी होती है कविता,
अपनी ही शर्तो पर अपने कवि को चुनती है कविता,
अपने तिलिस्म में बांध कठपुतली सा खेल खिलाती है,
एक समय पे एक ही टिकता कवि में दुनिया या कविता !!

विरेन्द्र जैन माहिर
वड़ोदरा गुजरात

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