
अर्क-कविता भावों का सम्मिश्रण है भावों का अकाल है
हे कविता तुम्हे भाव चाहिये
सृजनात्मक लगाव चाहिये
भावों का अकाल है
मशीनी युग का कमाल है
प्रेम संवेदनाये अब किस्सों के दौर है
स्वार्थ लालच वैमनस्यता आत्मिकता के छोर है
काव्य सृजन भौतिकता का पैमाना बन गया है
मुद्रा कमाने का अनमोल एक खजाना बन गया है
काव्य संकलन की दुकाने खुल गयी है
पैसों के पेट से मैडल प्रशस्ति पत्र उगल रही है
समाज सुधार जग सुधार के जिम्मेदारियों से हे काव्य तुम बरी हो गये
चटपटे मसालेदार शाब्दिक चयन से हे काव्य तुम आधुनिकता मे निखर गये
अब ना मनुष्य है और ना ही मनुष्यता बाकी है
मशीनी दौर मे भावनाओं की जगह मशीन ही साथी है
काव्य सृजन भी अब एक व्यवसाय हो गया
जो मन का दर्द चंद लोगों मे बाकी था हवा हो गया
काव्य भी काव्यात्मक मौन हो गया
इस बदलती दुनियाँ मे मोबाइल फोन हो गया
काव्य दिवस पर उदगार मेरे कुछ यूँ निकल गये
काव्यात्मक एक कसक थी ऐसे ही बह गये
स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











