
काव्य मे बसे हैं हिय के उद्वेलित मनोद्गार।
काव्य अंतर में बहती भावनाओं की धार।
काव्य सुर सरिता हिय आप्लावित बारंबार।
काव्य बिना निस्सार ये जीवन और संसार।
मृत्युलोक में भावजगत भावनाओं की धार।
चिरंतन सत्ता में काव्य करे भाव साकार।
भजन व देश प्रेम कविता बिन पड़े मझधार।
सभी धर्मकर्म हों पूरे काव्य अनुपम उपहार।
अपनी सत्ता का ये उद्बोधन उपजे राष्ट्रगान।
जहां न कविता वो जग जंगल पशु समान।
कविता जग जीवन में अमृत सम मृदुगान।
सभ्य समाज को भाव तरंग में कराए स्नान।
काव्य बसा जीवन में ज्यूं कुसुम में मकरंद।
जिस गृह काव्य आनंद है, ज्यूं पुष्प सुगंध।
परमात्मा की कृपादृष्टि सदा दीर्घायु आनन्द।
पक्षियों चहचहाट है प्रकृति के खिलें नवरंग।
महेश शर्मा, करनाल











