
कविता तू कितनी सुंदर प्यारी है ,
तू कहाॅं किसी से कभी भी हारी है ।
रही हो संघर्षरत तुम युगों युगों से ,
नहीं कभी तेरी कोई भी लाचारी है ।।
नहीं तेरे कोई भी हस्त पाद मुख ,
नहीं तेरे पास कोई भी ये वाणी है ।
चलती फिरती बोलती चिल्लाकर ,
जाने कैसी तू इस धरा का प्राणी है ।।
कुरीतियों का विरोध करती है सदा ,
पाखंडियों को कहाॅं तू भा पाती है ।
कुनीतियों का तू तो राज खोलती ,
भ्रष्टाचार देख खूब तू चिल्लाती है ।।
किंतु कमी तुझमें तो एक बहुत है ,
जिसने भी तुझे दिल से अपनाया है ।
धरा ने भी तुझे हृदय से है लगाया ,
किंतु जमाने ने उसे ही ठुकराया है ।।
तेरे कारण गाॅंव घर समाज से बागी ,
तेरे कारण जो कवि कहलाता है ।
होता जो पग पग पर है अपमानित ,
किंतु रवि रूप में प्रकाश फैलाता है ।।
कभी तुम आदर प्यार बरसाती ,
कभी उगलती प्रज्वलित आग हो ।
जो भी छुपाकर चलते निज दाग ,
उन्हीं का सार्वजनिक दिखाते दाग हो ।।
कवि जीवन अवश्य अंधकारमय ,
किंतु तू कभी भी अंधकारमय नहीं ।
तव उर आदर स्नेह और सम्मान ,
सभ्यता शिष्टता हो बरसाती यहीं ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।











