
शब्दों की यह सरिता, मन से बहती जाती,
भावों के सागर में, गहराई दिखलाती।
कविता है आत्मा की मधुरतम अभिव्यक्ति,
हर हृदय की धड़कन में, प्रेम-ज्योति जगाती॥१॥
जब मौन हो जाए वाणी, शब्द न साथ निभाएँ,
कविता बनकर भाव, स्वयं स्वर गुनगुनाएँ।
दर्द हो या आनंद, सब इसमें समा जाते,
जीवन के हर रंग यहाँ, सजीव हो उठ आते॥२॥
कविता है दीपक, अंधियारे को हरती,
अंतर की पीड़ा को, कोमलता से धरती।
यह सत्य का दर्पण, यह प्रेम का संदेश,
मानवता को देती, एकता का परिवेश॥३॥
कभी बन जाती गीता, कभी कबीर की वाणी,
कभी तुलसी की चौपाई, कभी मीरा की कहानी।
हर युग में यह रही, चेतना की आवाज़,
कविता ही जग में भरती, नवजीवन का साज़॥४॥
आओ आज के दिन, हम यह संकल्प उठाएँ,
शब्दों से मानवता का, सुंदर रूप सजाएँ।
कविता केवल पंक्ति नहीं, यह जीवन का सार,
विश्व कविता दिवस पर, इसे करें हम साकार॥५॥
योगेश गहतोड़ी ‘यश’











