
— ओम कश्यप
रिश्तों की धूप में कुछ साये भी होते हैं,
हर चेहरे के पीछे कुछ सच्चे भी होते हैं।
कहने को तो अपना कहते हैं सब हमको,
वक़्त पड़े तो कितने अपने भी होते हैं।
खामोश निगाहों में छुपा दर्द समझ लेना,
अल्फ़ाज़ से ज़्यादा ये लम्हे भी होते हैं।
मुस्कान के पीछे जो आहें दबा लेते,
ऐसे ही तो रिश्तों के क़िस्से भी होते हैं।
कभी पास आकर भी दूरी सी लगती है,
कुछ रिश्ते अजीब से धागे भी होते हैं।
टूटे तो बिखर जाएं, जोड़े न जुड़ पाएं,
काँच के जैसे कुछ रिश्ते भी होते हैं।
दिल से जो निभाए जाएं उम्र भर के लिए,
वो ही तो असल में अपने भी होते हैं।










