
रौशन है घर उसी से,
वो घर की शान होती है,
माँ के जिगर का टुकड़ा,
उसकी जान होती है।
उँगली पकड़कर चलना,
जिसे माँ ने सिखाया था,
आज उस नन्हीं परी से,
माँ की पहचान होती है।
दुख अपना छुपाकर जो,
सदा हँसती रही हर पल,
बेटी की एक सिसकी से,
वो परेशान होती है।
वो आँगन की चहक है,
वो दुआओं का है इक दरिया,
बिदा होकर भी जो,
घर का ही अरमान होती है।
नसीबों वाली हैं वो माँ,
जिनके पास बेटियां होती हैं,
ईश्वर की भक्ति का वो,
सुखद वरदान होती है।
कविताकार
रीना पटले शिक्षिका
जिला – सिवनी, मध्यप्रदेश










