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मंज़र-ए-तूफाॅं

फिर से तेरी कश्ती घिरी तूफाॅं
जाने तूं सो गया कहां
चहूं दिशाओं में उठ रही स्वार्थ की लहरें
इन लहरों में ढूंढने चला
इन के सहारे
ये कश्ती लगेगी किनारे
पतवार की क्या जरूरत
वो जला दी मिली थी कुछ दिनारें
इसी आशा से कटेगा सफर
वक्त एक दिन आएगा
टूटा फट्टा लगाए हैं छाती से
दूर-दूर तक दिखता नहीं किनारा
इन लहरों का हमें भरोसा
एक दिन मिल जाएगा किनारा

इन लहरों पर है हमें भरोसा
इस टूटी नाव में खुदगर्ज वक्त ने
सभी कुछ है परोसा
लहरों को भी तो वक्त का भरोसा
थोड़ा सुस्ता लें
नींद किसे आती है
आज पूरी तरह आजाद हैं
लहरें गले लगी
मानों कह रही —
तुम हमारे हो, हम तुम्हारे हैं हम दम
फिर से गूंजे गा तराना —
हम लाएं तूफाॅं से कश्ती निकाल के …. ।

   महेश शर्मा, करनाल

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