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माँ का बुढ़ापा मेरी बिमारी

बड़ी ही कठिन है माँ ये दुनियाँ तुम्हारी हमारी है
तेरा बुढ़ापा और मुझे मिली ये असाध्य बिमारी है
तेरा मेरा दर्द एक है तड़प भी एक है
समझे जो वो जान नही कोई हमारी है
बड़ी ही कठिन है माँ ये दुनियाँ तुम्हारी हमारी है

दिन रात के ये नासुर कष्टों से तेरी मेरी लड़ाई है
दर्द की कैसी ये तन्हाई है तेरे मेरे हिस्से ही आई है
निराशा चारो ओर है उम्र बीमारी का ही जोर है
माँ जीवन की ये लड़ाई है जो सिर्फ मेरी और तुम्हारी है
बड़ी ही कठिन है माँ ये दुनियाँ तुम्हारी हमारी है

माँ तेरा कलेष मेरा कलेष हर दिन ही टकराता है
वक्त का सितम है बनकर कहर जो रोज आता है
निराशा का ये घोर भाव कभी तेरा उतरता कभी मेरा उतर जाता है
यही वो प्रकोप है माँ जो तेरा बुढ़ापा मेरी बिमारी है
बड़ी ही कठिन है माँ ये दुनियाँ तुम्हारी हमारी है

शर्मिंदा हूँ माँ बिमार होकर तेरा बुढ़ापा नही संभाल पाया
तू तो माँ बन दिन रात मेरी रही मैं ही बेटा ना बन पाया
मेरी बिमारी मे जिंदगी तेरी भी बरबाद हो गई
आबाद होते हुए भी आबाद ना रह गई
खूब सताया माँ तेरे इस बुढ़ापे को कि मुझे मिली असाध्य ये बिमारी है
बड़ी ही कठिन है माँ ये दुनियाँ तुम्हारी हमारी है

कहने को रिश्ते बहुत हमारे है
बाँटने को गम हमारे सब किनारे है
मन का अकेलापन मन मे ही अकेला है
ये तन्हाई का आलम है भरा पूरी दुनियाँ का रेला है
गम माँ मेरी बिमारी नहीं तेरी सेवा मे आड़े मेरी बिमारी है
बड़ी ही कठिन है माँ ये दुनियाँ तुम्हारी हमारी है


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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