
ये धरती मां जैसी दुलारी प्यारी
हरी -भरी धरती विरासत है हमारी
आंचल में इसके नदियां है बहती
गोद में हैं संरक्षित जंगल और पहाड़
इसने दी है हमें सांसों का अमूल्य उपहार
सांसों के बिना जीना है दुश्वार
हमें अन्न दिया है भूख मिटाने को
पानी दिया है प्यास बुझाने को
छांव दिया है थकान मिटाने को
पर सोचो जरा, बदले में हमने क्या दिया
सिर्फ धुंआ दिया, दूषित किया पर्यावरण
जहर दिया नदियों को, कचरा डालकर
पेड़ों को काटा, प्लास्टिक को अहमियत दी
धरती मां की कोख को ही छीन लिया
ग्लेशियर भी हैं पिघल रहे
धरती का अत्यधिक गर्म होता जा रहा है हर दिन
कभी बाढ़ तो कभी सूखा हम सब झेलते
अब भी वक्त है, हम संभल जाएं
एक पौधा हर शुभ अवसर पर जरूर लगाएं
प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करें
पानी के हर एक बूंद का मोल समझें
लिए हम सब संकल्प लेते हैं कि
धरती को प्रदूषित नहीं होने देंगे
ये हमारी धरोहर है आने वाले भविष्य का
आओ इसे हरा- भरा बनाए रखें
आज विश्व पृथ्वी दिवस पर इसे वंदन करें, अभिनंदन करें
डॉ मीना कुमारी परिहार











