
जनक सुता जग जननि जानकी।
अतिशय प्रिय करुणा निधान की।।
तेहि के युग पद कमल मनावऊ।
जासु कृपा निर्मल मति पावऊ।।
इन्हीं भावों से गोस्वामी तुलसीदास जी सीता जी को चित्रित करते हैं।।
वैशाख शुक्ल नवमी को सीता नवमी
के नाम से जानते हैं
और इसी तिथि कोजनक नंदिनी जानकी जी का अवतरण दिवस मनाते हैं।।
एक बार मिथिला नगरी में भारी
अकाल पड़ा
मिथिला नरेश को हल लेकर
खेतों में निकलना पड़ा।।
अचानक हल चलते चलते
किसी वस्तु से टकराया।
महाराज जनक जी के विस्मय भरे
नेत्रों ने अलौकिक आभा युक्त
दिव्य कन्या शिशु का दर्शन पाया।
मानो धरती माता ने उन्हें दिव्य कन्या
रत्न रूपी उपहार प्रदान किया है।।
हल की नोंक सीत से प्रकट होने
वाली वह कन्या आदिशक्ति जगत
जननी सीता नाम से जानी जाने लगी
महाराज जनक जी का महल और
माता सुनयना जी की गोद को
सुशोभित करने लगी।।
सीता जी बाल्यकाल से ही
दिव्य विभूति से संपन्न थीं।
सदा अलौकिक कृत्य किया करती थीं।।
एक बार पिता के यहां रखा
शिव जी के धनुष को उठा लिया।
पिता ने देखते ही तत्क्षण प्रण किया।
जो इस धनुष को भंग करेगा।
वही सीता को वरण करेगा।।
रघुकुल शिरोमणि दशरथ नन्दन
श्री राम ने जनक जी का यह
प्रण पूर्ण किया।
सीता जी ने श्री राम जी को जयमाला
पहनाकर वरण किया।।
सीता राम जी का मंगलमय
विवाह सम्पन्न हुआ।।
कवियित्री सुभद्रा द्विवेदी
‘विद्यावाचस्पति’, लखनऊ











