
कैसा जमाना आया है ?
सही, झूठ देख घबराया है,
सारे जहाँ के बुरे कृत्य कर,
पापी शान से मुस्काया है..
कैसा जमाना आया है..?
अपनों से करके लड़ाई,
गैरों की करता बढ़ाई,
गलत पर उनको टोक दो तो,
पापी धर्म की देता दुहाई,,
अपनों से उनका हक छीन कर,
अपने परिवार को भिन्न भिन्न कर,
दुनिया में नाम कमाना चाहता,
अपनों से अपने को खिन्न कर,,
झूठा अपनापन दिखाकर,
दिखावे का भोलापन जताकर,
भाई से भाई को अलग किया,
एक दूसरे का दोष बता कर,
अपनों को धोखे में रख कर,
एकाकी चक्र चलाया,
खुशहाल परिवार को तोड़ कर,
ऐसा क्या सुख पाया ?
कलियुग का समय ऐसा,
कोई नही रहता एक जैसा,,
आज कर ले बुरे कर्म सारे,
कल को फल पायेगा वैसा,,
दौलत के पीछे पड़ता रहा,
पाप की सीढ़ी चढता रहा,
पर खेल नियति का है ऐसा,,
तेरे साथ नही जायेगा पैसा,,
वक़्त बुरा आयेगा,
संकट का बादल छायेगा,
तेरे कर्मो का हिसाब देने,
तेरा काल जरूर आयेगा..
“ये सिर्फ कविता नहीं…
किसी के घर की सच्ची कहानी है।”
मेघा दास
सरायपाली महासमुन्द छ.ग











