
यकीं है नही एक दूजे पर बस जिंदगी की डोर पकड़े चले जा रहे है
कुछ उसकी मजबूरियाँ कुछ हमारे सितम कि बढ़े चले जा रहे है
माना समय है बुरा किसी के आगे बेचारे नही बने
अकाल समय की तरह बाज़ार के नज़ारे नही बने
हारे है अपने क्या पराये क्या सभी ने शंका जताई
खोटा सिक्का जान दूरियाँ सभी ने बनाई
जिंदगी से आज हारे है अपने पराये का अर्थ जान गये
लोगों की फिरती नज़रों का सिला पहचान गये
खराब अगर समय हो तो हमसाया भी पराया होता है
अपनों से क्या उम्मीद खुदा की बंदगी भी वक्त जाया होता है
खराब वक्त के हमनें भी खूब जलवे देखे
जिनके वास्ते दुनियाँ से टकराये ए दोस्त उन्हीं के नज़र मे है धोखे
क्या कहे कि समझोते की जिंदगी है बस समझोते मे ही जिये जा रहे है
अपना सब छोड़ दिया उन्ही के पैबंद मे मजबूरी को गले लगा रहे है
स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











