
ओ मजदूर, ओ मजदूर
तू नहीं है मजबूर
तेरा भाग्य नहीं है क्रूर
तुझ पर छाया है मेहनत का सरुर।
ओ मजदूर, ओ मजदूर
तू है नव सृजन का मूल
तू अपनी शक्ति कभी मत भूल
तुझे लोगों के चाहे चुभें शूल।
ओ मजदूर, ओ मजदूर
बिना तेरे सृजन अधूरा
बिना तेरे भू पर अंधेरा
तेरे श्रमकणों से उदय होता सवेरा।
तू प्राची का प्रकाश है रे!
तेरी मेहनत पर मनुज को नाज है रे!
लोकेश कौशिक
सहायक प्रोफेसर हिन्दी
हरियाणा।













