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विधि का विधान


विधि की है निधि
सृष्टि में जहां तक
मानव दृष्टि है विस्तृत
सीमाहीन ये जगत उसकी है माया।
अनन्ता का अंतहीन जगत
मानव सदियों ढूंढ रहा
अनादि रहस्य को
कहां छुपा है सुख का मूल
अनन्त का रहस्य समझ न पाया ।

न जाने किस भ्रमजाल में सदा से है भरमाया।
वो सोच रहा अज्ञानतावश
मैं ही — ‘स्वंभू’ जगत में
अपनी हठ को ही सर्वोपरि मान कर
इच्छा पूर्ति हेतु
जग को अंतहीन संघर्ष में उलझाया ।
ये उलझनें नहीं वश में उसके
अनादि शक्ति का ये ‘कालचक्र’ उसकी है माया।

पूर्ण सुख की खोज — कभी न हो पूरी
नित्य-निरंतर ये खोज बनी दुस्साध्य
ये अंधी दौड़ सदा रही अधूरी
मनीषियों की यह खोज — ‘ब्रह्म सत्यं जगन्नमिथ्या ‘।
ये जग तो भवसागर
आत्मा ओढे नया कलेवर
मृत्यु लोक में आ कर
पुनः पुनः कर्म निभा कर
सदा विचरण शील रहे
कहां छिपी है सुखों की गागर।

महेश शर्मा, करनाल

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