
‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।’
{शबर स्वामी}
जो जन्मता है उसे मारना भी पड़ता है और मरने वाले का पुनर्जन्म भी होना प्राय: निश्चित है । अपने शास्त्र कहते हैं कि ‘चौरासी-लाख’ योनियों में भटकता हुआ प्राणी भगवत कृपा से तथा अपने पुण्यपुंजों से मनुष्य योनि प्राप्त करता है । मनुष्य शरीर प्राप्त करने पर उसके द्वारा जीवन पर्यंत किए गए अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार उसे पुण्य-पाप अर्थात सुख-दुख आगे के जन्मों में भोग में पड़ते हैं—
‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतम कर्म शुभाशुभम् ।’ { तन्त्रवार्तिक}
शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार ही विभिन्न योनियों में जन्म होता है,पाप कर्म करने वालों का पशु-पक्षी, कीट-पतंग और तिर्यक् योनि तथा प्रेत पिशाच आदि योनियों में जन्म होता है, पुण्य कर्म करने वाले का मनुष्ययोनि, देवयोनी आदि उच्च योनियों में जन्म होता है ।
मानवयोनि के अतिरिक्त संसार की जितनी भी योनियाँ हैं, वे सब भोग योनियाँ हैं, जिनमें अपने शुभ एवं अशुभ कर्मों के अनुसार पुण्य-पाप अर्थात् सुख-दुख भोगना पड़ता है । केवल मनुष्य योनि ही ऐसी है, जिसमें जीव को अपने विवेक’बुद्धि के अनुसार शुभ-अशुभ कर्म करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है ।।
मनुष्य की नैतिक, मानसिक, आध्यात्मिक उन्नति के लिए इसके साथ ही बल-वीर्य, प्रज्ञा और दैवीय गुणों के प्रस्फुटन के लिए शास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट संस्कारों से व्यक्ति को संस्कारित करने की आवश्यकता है ।।
संस्कार शब्द का अर्थ ही है, दोषों का परिमार्जन करना ।
जीव के दोषों और कमियों को दूर कर उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष– इन चारों पुरुषार्थ के योग्य बनाना ही संस्कार संस्कार करने का उद्देश्य है ।
‘संस्कारों नाम स भवति यास्मिन् जाते पदार्थो भवति योग्य: है कश्चिदर्थस्य ।’
अर्थात्—
संस्कार वह है जिसके होने से कोई {पदार्थ या व्यक्ति} किसी कार्य के लिए योग्य हो जाता है ।
योग्यतां चादधाना: क्रिया: संस्कारा: इत्युच्यन्ते ।
अर्थात्—
संस्कार वे क्रियाएं तथा रीतियाँ हैं, जो योग्यता प्रदान करती हैं ।
यह योग्यता दो प्रकार की होती है—
१~ पाप मोचन से उत्पन्न योग्यता ।
२~ नवीन गुणों से उत्पन्न योग्यता ।
संस्कारों से नवीन गुणों की प्राप्ति तथा पापों या दोषों का मार्जन होता है ।।
वैदिकै: कर्मभि: पुण्यकर्म एकादशी द्विजन्ह पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् ।
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेहर न ।।
वेदोक्त गर्भाधान-आदि पुण्यकर्मों द्वारा द्विजगणों का शरीर-संस्कार करना चाहिए । यह इस लोक और परलोक दोनों में पवित्र करने वाला है ।।
सनातन धर्म की यह मान्यता है कि एक बार माता के गर्भ से जन्म होता है और दूसरा जन्म होता है उपनयन संस्कार से ।
इसी आधारपर जिसके वैदिक संस्कार हुए हों, उसे द्विज अर्थात् दो बार जन्म लेने वाला कहा जाता है । यह संस्कार हिंदू जाति की एक बड़ी विशेषता के रूप में माने गए हैं ।।
अगले लेख में—
क्रमशः …..
संस्कार का प्रयोजन और उसके भेद ।
साभार— गीता प्रेस गोरखपुर
लेखन एवं प्रेषण—
पं. बलराम शरण शुक्ल
नवोदय नगर हरिद्वार









