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माँ

माँ,
तुम अब मेरे पास नहीं हो,
तो ये घर सिर्फ दिवारों का ढांचा
रह गया है,
तुम्हारी आवाज,
प्रभात की वो रोशनी थी,
जो थके हुए मन पर
हौले-हौले उतरती थी,
तुम्हारे हाथों में
सिर्फ स्पर्श नहीं था,
बल्कि-
एक अदृश्य भरोसा था,
जो मेरे हर डर को ,
छोटा कर देता था,
मैं अब जब भी,
दुनिया की भीड़ में
खुद को खोने लगती हूँ,
तुम्हारी स्मृति-
मुझे फिर से मेरा नाम बता देती है।
‘ माँ ‘
तुमने कभी अपने हिस्से का,
आकाश नहीं मांगा था,
बस मेरी उड़ानों के लिए,
खुले आसमान को बचाये रखा था,
तुम प्रेम का वह रूप रही हो,
जिसे शब्द छू तो सकते हैं,
पर पूरा कह नहीं सकते,
मेरे जीवन में जो भी अच्छा है,
उसकी प्रथम वजह तुम हो,
जो मैं आज भी संभली हुई हूँ,
उसकी भी सबसे गहरी वजह भी तुम ही हो।।

      डॉ. पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
        लेखिका एवं कवयित्री
          बैतूल, मध्यप्रदेश

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