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अंतहीन उड़ान

अंतहीन उड़ान की सैर करना चाहती हूँ।
मैं इस विश्व में खूब घूमना चाहती हूँ।।

मेरे मन का पंछी आजकल नियंत्रण में नहीं रहता।
सुख-दुख व लाभ-हानि की परेशानी नहीं चाहता।।
दुनिया भर में भ्रमण करना ही अब वह है चाहता।
पावन गंगा के समान निरंतर बहता ही वह जाता।।

अब तो कभी न रूकने वाली उड़ान चाहती हूँ।
ऐसा अद्भुत स्वयं का विमान मैं चाहती हूँ।।
सांसारिक बंधनों से मुक्त होना चाहती हूँ।
युक्ति चलाने वालों से अब तो मुक्ति चाहती हूँ।।

तन-मन की सकारात्मकता चारों ओर फैलाएँ।
नए दौर के साथ आप खुद भी चाल मिलाएँ।।
स्वार्थ नहीं केवल निस्वार्थ-भाव भीतर लाएँ।
सभी के मददगार बनने में ही समय बिताएँ।।

अंतहीन उड़ान की आप भी तैयारी कीजिए।
मन के पंछी को अधिक मत रोका कीजिए।।
कोई कुछ भी करे आप मत टोका कीजिए।
प्रत्येक क्षण तन से खूब काम लिया कीजिए।।

अंतहीन उड़ान अब कभी नहीं रूकनी चाहिए।
धरा से लेकर गगन तक शीघ्र तेज़ होनी चाहिए।।
सकारात्मक बदलाव के लिए सोच बदलनी चाहिए।
तन-मन में घूमने की ताकत अब तो पूरी होनी चाहिए।।

कवयित्री-डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)

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