
प्रसिद्ध हैं ये कथ्य धरा मे आज भी,
कि घास रोटी खाई ,जारी रखी लड़ाई ,
ना झूके कभी वो मुगलों के सामने,
ना स्वीकार किया अधीनता कभी,उसने ।
राणा उदयसिंह पिता,माता जयवंताबाई,
मेवाड का वो रक्षक,देश का था वो भाई,
ओजस्वी,तेजस्वी,अद्भुत थे,महाराणा ,
देख उसे पीछे हटते ,मुगलों की सेना ।
वीर पुत्र थे वे अपने धरा के वास्ते,
अरिदल को वो पलभर मे चीर देते,
अकबर तो उसका सामना करना ना थे,चाहते
सुने थे युद्ध कौशल के,बहुत सारे किस्से ।
हल्दीघाटी का युद्ध या दिवेर का,साहस से लड़े ,
चेतक का सवारी कर,दुश्मनों पर टूट पड़े ,
भाला भारी था उनका,और कवच भी
दंग रहते युद्ध मे उसे देख,सभी ।
ऐसे महान वीर सुपुत्र की जंयती पर,
निवेदन है सबो से हाथ जोड़कर,
कि,महाराणा प्रताप की स्मरण करे,
कष्ट भले उठावे,लेकिन पराधीन स्वीकार ना करें ।
चुन्नू साहा पाकूड़ झारखण्ड













