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माँ का आँचल : एक संस्मरण

मेरा सैनिक जीवन और मेरी दादी माँ, माँ

मैं एक सैनिक हूँ,
मैं अब रिटायर्ड हूँ,
मेरी माँ की कहानी,
मेरी अपनी जुबानी।

बचपन में जब मैं गाँव में रहता था और गाँव के ही स्कूल में पढ़ता था, आठवीं क्लास तक वहीं पढ़ा था, दादी माँ का दुलारा और माँ का बहुत प्यारा था। आठवीं के बाद दूसरे गाँव के कॉलेज में पढ़ने जाता था और दसवीं वहीं से पास कर कानपुर शहर चला गया। दादी माँ और माँ की कमी खलती थी, जल्दी उठना, ख़ुद ही खाना बनाना, कॉलेज जाना और लौट कर फिर यही सब करना तब दादी माँ और माँ की बहुत याद आती थी। धीरे धीरे दादी माँ बीमार रहने लगीं, तब पंद्रह दिन में पचास किलोमीटर साइकिल चला कर देखने जाता रहा और एक दिन शहर में ख़बर मिली कि दादी माँ नहीं रहीं। मेरी परीक्षाएँ चल रही थीं और मैं दादी माँ के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाया था।
पढ़ाई करते करते नौकरी भी लग गई, डाक विभाग में।एक साल के बाद सेना डाक सेवा में चला गया। तब साल में एक दो बार ही घर परिवार में आना जाना होता था। सेना में जाने से पहले विवाह हो चुका था। फिर बच्चे भी बड़े होने लगे और परिवार को लखनऊ में रहना पड़ा, क्योंकि बच्चों की पढ़ाई शुरू हो चुकी थी। मेरा प्रमोशन भी होता रहा और इसी बीच मेरे पिता जी नहीं रहे। तब मैं लखनऊ में छुट्टी पर था, उनके अंतिम संस्कार में शामिल हो सका था।

अब तक मेरी माँ वृद्ध हो चुकी थीं, बीमार रहने लगी तो लखनऊ आ गईं, परिवार के अन्य सदस्य मेरे भाई, भतीजे भी तब तक लखनऊ में रहने लगे और माँ कभी एक बेटे के पास कभी नाती पोतों के साथ रहती थीं। जब मैं छुट्टी आता था तो मेरे पास आ जाती थीं।
सन् 1999 की बात है मैं छुट्टी आया हुआ था तब माँ बहुत बीमार थीं, उन्हें कैंसर हो गया था और आर्मी अस्पताल में इलाज चल रहा था। डॉक्टर्स ने बताया था कि अंतिम स्टेज की बीमारी है कोई इलाज खतरनाक हो सकता है इसलिये घर में रखकर जो सेवा कर सकते हो वह करिये।

खैर, मेरी छुट्टी खत्म होने को आयी तो यह उचित लगा कि माँ भाई/ भतीजे के घर रहने जाँय क्योंकि मेरी पत्नी अकेले देखभाल कैसे कर पाएँगी, अस्पताल कैसे ले जायेंगी।
जब माँ मेरे घर से जाने लगीं और कार में बैठीं तो मुझे जिस भाव से देखा तो मुझे रुलाई आ गईं और मैं उनकी तरफ़ देख नहीं सका। वह ऐसे देख रही थीं कि जैसे मैं हमेशा के लिये उनसे विछुड़ रहा हूँ!
मैं श्रीनगर में पोस्टेड था, ड्यूटी जॉइन करके मुश्किल से एक सप्ताह बीता था कि भाई का टेलीग्राम मिला कि माँ नहीं रहीं। मुझे तुरन्त छुट्टी भी मिली लेकिन श्रीनगर से लखनऊ पहुंचना और माँ के अंतिम दर्शन कर पाना असंभव था।
मैंने किसी तरह पहुँचने की कोशिश की पर तीसरे दिन ही पहुँच सका तब तक मेरी माँ दुनिया से विदा ले कर परलोक जा चुकी थीं और मैं अंतिम दर्शन भी नहीं कर सका। मुझे माँ की वह कातर दृष्टि आज भी नहीं भूलती है।
दादी माँ और माँ का प्यार दुलार स्वर्गीय सुख से भी बड़ा होता है। माता – पिता और परिवार का स्नेह- प्रेम अनोखा, अविरस्मरणीय होता है।

माता- पिता, पितृ देवो भव,
अतिथि देवो भव।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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